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आखरी पन्नें (१) दीपक शर्मा 'कुल्लुवी '

आखरी पन्नें (१) दीपक शर्मा 'कुल्लुवी '

इन आखरी पन्नों में ज़िन्दगी का दर्द है
कुछ हमनें झेला है कुछ आप बाँट लेना
मेरे क़त्ल-ओ-गम में शामिल हैं कई नाम
ज़िक्र आपका आए न बस इतनी दुआ करना
.......
आखरी पन्नें मेरी ज़िंदगी की अंतिम किताब,अंतिम रचना,आखरी पैगाम कुछ भी हो सकता है हो सकता है यह केवल एक ही पन्नें में ख़त्म हो जाए य सैंकड़ों हजारों और पन्ने इसमें और जुड़ जाएँ क्योंकि कल किसनें देखा है खुदा ने मेरे लिए भी कोई न कोई दिन तो ऐसा निश्चित ज़रूर किया ही होगा जिसका कल कभी न आएगा मैं एक लेखक हूँ जिसे हर रोज़ कुछ न कुछ नया लिखने की चाह रहती है, इक प्यास रहती है और मैं कुछ न कुछ लिखता ही रहता हूँ मैं जानता हूँ कि मैं अपनीं इस आखरी किताब आखरी रचना का आखरी पन्ना कभी पूरा नहीं कर पाऊंगा... इसमें जितने भी पन्नें जुड़ जाएँ यह फिर भी अधूरी ही रहेगी ......और यह आखरी पन्ना कभी कोई भी लेखक पूरा नहीं कर पाया होगा चाहे वोह मुंशी प्रेम चाँद हों,शैक्सपियर हो,मिल्टन हो या कोई और. और न ही कोई लेखक इसे पूरा कर पायेगा चाहे वोह मेरे पिता श्री जयदेव विद्रोही हों या मैं खुद आखरी पन्ना सबका ही अधुरा रह गया, अधूरा रह जाएगा.......
वक़्त के हाथों में हम मज़बूर हो गए
उनको ऐसा लगता है हम उनसे दूर हो गए
यह 'दीपक कुल्लुवी' सबका ही तो कर्ज़दार है
बेवफाओं जैसे हम भी मशहूर हो गए

मेरे आखरी पन्नों में मेरे सबसे बड़े सहयोगी मेरे प्रेरणा स्त्रोत मेरे पिता श्री जयदेव विद्रोही मेरी दोस्त,मेरी मित्र,मेरी सबकुछ मेरी धर्मपत्नी 'कुमुद' ,मेरे दोस्त,दुश्मन ,अपने पराये ,यह दुनियां मेरा बेटा दीपंकर और मेरी बेटी दीपाली हैं कर्ज़दार मैं सबका ही हूँ क्योंकि किसी के लिए भी कुछ अधिक नहीं कर पाया,उसके लिए भी कसूरबार मुझसे अधिक मेरी ईमानदारी,मेरी शराफत,मेरी सच्चाई और मेरा भोलापन है जिसकी कलयुग के इस दौर में कोई ज़रुरत ही नहीं चालाकी चापलूसी,बेईमानीआज के दौर कि मांग है जो हमें कबूल नहीं

'इमानदारी कि हार कबूल है हमें'
'बेईमानी से जीतना हमें नहीं भाता'

हो सकता है सारी दुनियां को मुझसे कोई न कोई शिकायत हो और यह भी तो हो सकता है कि मुझे भी इस दुनियां से दुनियांवालों से अपनें परायों से कोई न कोई शिकायत हो जहाँ प्यार मुहब्बत है वहां नफ़रत,गिला शिकवा,बेरुखी सब संभव है मेरे आखरी पन्नों में आपके सामने कुछ भी आ सकता है मेरी कहानी,कविता शे-र,ग़ज़ल,दोहे यहाँ तक कि भजन भी और किसी भी भाषा में हिंदी,उर्दू,पंजाबी य अंग्रेजी अब यह फैसला आपको खुद करना है कि आपको क्या पढना है और क्या नहीं आपको क्या अच्छा लगता है क्या नहीं मैं नहीं जानता मैं तो केवल एक लेखक हूँ बस लिखता जाऊँगा आपको अच्छा लगे तो पढ़ लेना वर्ना पन्ना छोड़कर आगे बढ़ जाना मुझे हरगिज़ बुरा न लगेगा
ज़िंदगी अपनी यादों की इक खुली किताब है
समेटे हुए हैं जिसमें हम अपने आस पास का दर्द
इसको खोलने से पहले बस इतना ख्याल रखना
मेरे दर्द-ओ-गम में कहीं आप तो शामिल नहीं
अब तक मैं हजारों रचनाएँ लिख चुका हजारों छप चुकी ,छप रही हैं कई पत्र पत्रिकाओं में,मैगजीनों में इंटरनैट मैगजीनों में जस्ट इण्डिया मैगज़ीन में मेरी कहानियां,ग़ज़लें कविताएँ निरंतर प्रकाशित हो रही हैं जस्ट इण्डिया का में प्रेस रिपोर्टर भी हूँ इसके साथ मैं दिल्ली से छपनें वाली अखवार स्वतंत्र राईटर का जर्नलिस्ट भी हूँ इसमें भी मेरी रचनाएँ निरंतर छपती हैं
आपनें भी जुल्म-ओ-सितम कोई कम नहीं किये
गम का हर इक घूँट मुझको ला पिला दिया
कुर्वान हो गए हम तो आपकी खातिर
आपने मेरी मुहब्बत का क्या शानदार सिला दिया

दीपक शर्मा कुल्लुवी'
०९१३६२११४८६
०६-१२-२०१०.
क्रमश:
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Comment by Deepak Sharma Kuluvi on September 28, 2011 at 1:01pm

shukriya agarwal ji

Comment by Bhasker Agrawal on December 8, 2010 at 2:43pm
आखरी पन्ना सबका ही अधुरा रह गया...क्या बाड़िया बात कही आपने..बधाई

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