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रोया है कोई … नवगीत /वेदिका

घास का इक नर्म 

बिछौना बनाकर 

ओढ़ कर नीले  

गगन की सर्द चादर 

सोया है कोई …

ओस बिखरी है जो 

हरी हरी घास पर 

साँस भर भर आई 

हर साँस पर 

रोया है कोई …. 

कहीं पुरवाइयों में 

ओस की रुलाइयों में 

चूड़ियों सा चटका है 

टूटा, मेरी कलाईयों में 

बिखरा है कोई …

गर्म लहू जमा वह 

या ठंडी बरसात है 

कुहासे का झाग 

या तो चीख की आग

भिगोया है कोई … 

कत्थई निगाहें दौड़ी 

कितने सफेद कोस 

दर्द धूप में उड़ी,नर्म

आसुंओं की ओस 

खोया है कोई …. 

                 गीतिका 'वेदिका' 

 

मौलिक /अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on July 10, 2013 at 11:20pm

सुन्दर गीत आदरणीया गीतिका जी !
 

Comment by वेदिका on July 10, 2013 at 10:22pm

जी! जरुर आदरणीया प्राची जी! 

और भी प्रयास करुँगी,

मार्गदर्शन बनाये रखिये!!   


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 10, 2013 at 10:12pm

प्रिय गीतिका जी 

अंतर्भावों से सुन्दर शब्द चित्र उकेरे हैं...अब गेयता पर भी प्रयास कीजिये 

हार्दिक बधाई इस नवगीत प्रयास पर 

Comment by वेदिका on July 10, 2013 at 10:00pm

रचना कर्म को प्रोत्साहित करने हेतु आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय सौरभ जी!

Comment by वेदिका on July 10, 2013 at 9:59pm

आपका बहुत बहुत आभार 

आदरणीया कल्पना जी!

आदरणीया प्रीती जी! 

Comment by वेदिका on July 10, 2013 at 9:42pm

बहुत बहुत आभार!

आदरणीया कुंती जी!

आदरणीय राजेश कुमार जी!

स्नेही राम भैया!

आदरणीय यतीन्द्र जी! 

Comment by yatindra pandey on July 10, 2013 at 8:52pm

mere paas shabd nahi in panktiyo ki tarif ke liye bahut sundar a

abhar


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 10, 2013 at 6:44pm

ओस बिखरी है जो 

हरी हरी घास पर 

साँस भर भर आई 

हर साँस पर 

रोया है कोई ….

वाह !  सुन्दर प्रयास.  प्रयासरत रहें. तथ्य प्रस्तुतिकरण सहज हो रहा है. 

शु्भेच्छाएँ

Comment by कल्पना रामानी on July 10, 2013 at 6:42pm

मनभावन, सुंदर गीत के लिए  हार्दिक बधाई गीतिका जी

Comment by mrs.Preeti G.sharma on July 10, 2013 at 3:50pm
'Aadrniya, gitikaji, bahut sunder rachna pr badhai aapko

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