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टूटते रिश्तों की किरचें

 

टूटे रिश्तों की किरचियाँ ,

कभी जुड़ नहीं पातीं ,

शायद कोई जादू की छड़ी ,

जोड़ पाती ये किरचियाँ ।

.

ये चुभ कर निकाल देतीं हैं ,

दो बूंद रक्त की , और अधिक

चुभन के साथ बढ़ जाती है ,

पीड़ा न दिखाई देती हैं ।

.

चुप रह कर सह जाती हूँ ,

आँख मूँद कर देख लेती हूँ ,

शायद कोई प्यारी सी झप्पी ,

मिटा पाती ये दूरियाँ। .... अन्नपूर्णा बाजपेई

 

 

अप्रकाशित एवं मौलिक

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 11, 2013 at 2:47pm

आदरणीया अन्नपूर्णाजी, आपकी रचना आत्माभिव्यक्ति शैली में अंतर्सम्बन्धों की व्यथा को साझा करती है.

सादर बधाई स्वीकारें.

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 11, 2013 at 11:43am

आदरणीया यदि जादू की झड़ी होती तो मानव न जाने और क्या क्या करता अच्छा है कि जादू की झड़ी नहीं है. बहरहाल प्रयास हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by D P Mathur on July 11, 2013 at 8:50am

आदरणीया अनुपमा जी, सच है एक बार दरार पड़ जाने पर रिश्तों को वापस जोड़ना असम्भवं ही है इसलिए इन्हैं टूटने से बचाना ही एक उपाय है !
रिश्तों का सही चित्रण !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 10, 2013 at 9:58pm

आ० अन्नपूर्णा जी 

टूटे रिश्तों की चुभती किरचियों की पीड़ा.... सच में कोइ झप्पी होती इन्हें फिर जोड़ , दूरियां मुता देने के लिए 

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति 

हार्दिक बधाई 

Comment by mrs.Preeti G.sharma on July 10, 2013 at 3:46pm
'Aadrniya annpurna ji, aapne apni rachna me sch kha hai, rishte tutte hai to bahut drd hota hai, ek aisa drd jise koi bhi samajh na paye,, sunder rachna ke liye bahut badhai
Comment by राजेश 'मृदु' on July 10, 2013 at 1:37pm

दरकते रिश्‍तों पर आपके उद्गार काफी सुंदर हैं, ये भीतर तक पैठती है, झकझोरती हैं और बड़ी देर तक गूंजती हैं, सादर

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