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फूल चम्पा के सब खो गए
जब से हम शह्र के हो गए

रात फिर बेसुरी धुन बजाती रही
दोपहर भोर पर मुस्कुराती रही
रतजगों की फसल
काटने के लिए
बीज बेचैनी के बो गए

प्रश्न पत्रों सी लगने लगी जिंदगी
ताका झाकी का मोहताज़ है आदमी
आयेगा एक दिन
जब सुनेंगे यही
लीक पर्चे सभी हो गए

मौल श्री से हैं झरते नहीं फूल अब 

गुलमोहर के तले है न स्कूल अब
अब न अठखेलियाँ
चम्पई उंगलियाँ
स्वप्न आये न फिर जो गए

(मौलिक अवं अप्रकाशित)

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 3, 2013 at 12:12pm

वन्दना जी आपको गीत पसंद आया ..मेरा लेखन सार्थक हुआ| आभार 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 3, 2013 at 12:11pm

महिमा जी गीत पसंद करने के लिए शुक्रिया|

Comment by D P Mathur on August 3, 2013 at 9:38am

मौल श्री से हैं झरते नहीं फूल अब 

गुलमोहर के तले है न स्कूल अब
अब न अठखेलियाँ
चम्पई उंगलियाँ 
स्वप्न आये न फिर जो गए

  आदरणीय सर ,मनमोहक गीत की बधाई !

Comment by वीनस केसरी on August 2, 2013 at 9:31pm

// रात फिर बेसुरी धुन बजाती रही //
// दोपहर भोर पर मुस्कुराती रही //
// प्रश्न पत्रों सी लगने लगी जिंदगी //
// लीक पर्चे सभी हो गए //

//स्वप्न आये न फिर जो गए //

मज़ा आ गया ....
भाई ...
नव्यता के क्या कहने ....

Comment by vandana on August 2, 2013 at 6:20am

रात फिर बेसुरी धुन बजाती रही 
दोपहर भोर पर मुस्कुराती रही 
रतजगों की फसल 
काटने के लिए
बीज बेचैनी के बो गए

बहुत सुन्दर गीत 

Comment by MAHIMA SHREE on August 1, 2013 at 10:01pm

बहुत ही सुंदर गीत बधाई आपको ..

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