बहर : हज़ज़ मुसम्मन सलीम
१२२२, १२२२, १२२२, १२२२,
तुझे भूला हुआ होगा तुझे बिसरा हुआ होगा,
कहीं तो टूटके सीने से दिल बिखरा हुआ होगा,
बदलता है नहीं मेरी निगाहों का कभी मौसम,
असर छोटी सी कोई बात का गहरा हुआ होगा ,
तनिक हरकत नहीं करता सिसकती आह सुन मेरी,
अगर गूंगा नहीं तो दिल तेरा बहरा हुआ होगा,
जिसे अब ढूंढती है आज के रौशन जहाँ में तू,
तमस की गोद में बिस्तर बिछा पसरा हुआ होगा,
चली आई मुझे तू छोड़ कर चुपचाप राहों में,
तुझे महसूस शायद मुझसे ही खतरा हुआ होगा,
कहा रुकना नहीं जाना पलटकर मैं अभी आई,
अरुन अब तक उसी बारिश तले ठहरा हुआ होगा..
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
Comment
कहा रुकना नहीं जाना पलटकर मैं अभी आई,
अरुन अब तक उसी बारिश तले ठहरा हुआ होगा..
यह एक शेर पूरी ग़ज़ल पर भारी है.. :-)))
दिल से बधाई, भाई. .
आदरणीय अनन्त जी सुन्देर गज़ल के लिये ढेरों बधाईयां .
बदलता है नहीं मेरी निगाहों का कभी मौसम,
असर छोटी सी कोई बात का गहरा हुआ होगा ,
प्रिय अनंत जी खूबसूरत भाव लिए ...प्रेम को पोषित करते सुन्दर गजल ...रचते रहें
बधाई
भ्रमर ५
हार्दिक आभार अमन भाई जी स्नेह बनाये रखें
अब तक उसी बारिश तले ठहरा हुआ होगा.
बहुत दिल लगा कर , लिखा है भाई
आपका संदेश दिल तक गया है .........सुंदर !
धन्यवाद अनुज राम
बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया गीतिका जी
नीरज भाई जी दिल से शुक्रिया
हार्दिक आभार आदरणीय जीतेंद्र भाई जी
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय गिरिराज सर जी
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