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ग़ज़ल - कहकहों के दायरे में ..{अभिनव अरुण}

ग़ज़ल - 

कहकहों के दायरे में दिल मेरा वीरान है ,

गाँव के बाहर बहुत खामोश एक सीवान है |

 

उंगलियाँ उठने लगेंगी जब मेरे अशआर पर ,

मान लूँगा मैं कि मेरे दर्द का दीवान है |

 

वो सुनहरे ख्वाब में है सत्य से कोसो परे ,

आदमी हालात से वाकिफ मगर अनजान है |

 

छू के उस नाज़ुक बदन को खुशबुओं ने ये कहा ,

ज़िन्दगी से दूर साँसों की कहाँ पहचान है |

 

बढ़ रहा है कद अँधेरे का शहर में देखिये ,

हाशिये पर गाँव का दुबका हुआ अरमान है |

 

हाट एक सजती है पगडण्डी के दोनों छोर पर ,

और   इच्छाएं लिए   घुटता हुआ   इंसान है |

                             - अभिनव अरुण 

                               {19082013}

*सर्वथा मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment by Abhinav Arun on September 1, 2013 at 7:45pm

बहुत आभार आ. अखिलेश जी अशार आपके पसंद आये लेखन सार्थक हुआ .

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on September 1, 2013 at 6:15pm

बढ़ रहा है कद अँधेरे का शहर में देखिये ,

हाशिये पर गाँव का दुबका हुआ अरमान है |                                                                                                                  ************************************** अरुण भाई- ये पंक्तियां इस गजल की जान हैं ।  बधाई !!

Comment by Abhinav Arun on August 25, 2013 at 7:08pm
आ. मंजरी जी बहुत आभार आपका रचना की सराहना के लिए !!
Comment by mrs manjari pandey on August 25, 2013 at 3:17pm

     

बढ़ रहा है कद अँधेरे का शहर में देखिये ,

हाशिये पर गाँव का दुबका हुआ अरमान है |  आदरणीय अभिव अरूण जी अन्तर्मन को छूती हुई बेहतरीन गज़ल . हार्दिक बधाई

 

हाट एक सजती है पगडण्डी के दोनों छोर पर ,

और   इच्छाएं लिए   घुटता हुआ   इंसान है |  

Comment by Abhinav Arun on August 22, 2013 at 3:00pm

ये शेर मेरा भी पसंदीदा है आ. केवल जी ..अनुमोदन केलिए हार्दिक रूप से धन्यवाद आपका !!

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 22, 2013 at 9:23am

आ0 अभिनव अरून भाई जी! सादर प्रणाम!   लाजवाब और शानदार गजल। बहुत सुन्दर... //छू के उस नाज़ुक बदन को खुशबुओं ने ये कहा, ज़िन्दगी से दूर साँसों की कहाँ पहचान है//  बेहतरीन गजल प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें। सादर,

Comment by Abhinav Arun on August 22, 2013 at 6:11am

आ.श्री पियूष जी , ग़ज़ल को सराहने का शुक्रिया . आप ने जो विन्दु उठाये हैं उनपे पुनर्विचार कर सूचित करता हूँ ..सादर !!

Comment by Abhinav Arun on August 22, 2013 at 6:09am

हाँ आम ही हूँ... पर आज इस आम का सीजन नहीं रहा हर तरफ मुलम्मों का बोलबाला है उसे चीरने कोशिश रहती हैं मेरी रचनाएँ.. आपने मान दिया.. ह्रदय से आभार आ . गीतिका जी !!

Comment by Abhinav Arun on August 22, 2013 at 5:38am

बहुत बहुत आभार श्री अरविन्द जी !आपने शेर सराहा लेखन समादृत हुआ !!

Comment by ARVIND BHATNAGAR on August 21, 2013 at 9:14pm

हाट एक सजती है पगडण्डी के दोनों छोर पर ,

और   इच्छाएं लिए   घुटता हुआ   इंसान है |..........शानदार शेर है ....कुछ कह जाता है.... दोहराने का मान करता है| बधाई|

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