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गज़ल --" क्यों अन्धेरों में सुलह से रौशनी घबरा रही है "

2122    2122   2122    2122

******************************************

क्या हवायें आज कुछ पैग़ाम ले के आ रही है

धूप भी कुछ गा रही है, छाँव भी इतरा रही है

 

बेख़याली मे कहीं हम हद के बाहर तो नहीं है

आदमीयत आज बैठी क्यूँ यहां शर्मा रही है

 

इस जगह पर तो ख़िज़ां ने भी बहारें ओढ़ ली है

इसलिये ही ज़िन्दगी हर बार धोखा खा रही है

 

गुफ़्तगू  कुछ तो मोहब्बत और नफ़रत मे चली है 

वो भी कुछ समझा रही है ये भी कुछ समझा रही है

 

दोस्त मेरे भूख ज्यादा आज ही क्यों लग रही है

जब मुझे कुछ और ज़्यादा जेब भी तरसा रही है

 

अश्क मेरी आंख से बहना ही क्या काफ़ी नही था

क्यूँ  ये बदली आज पानी इस तरह बरसा रही है  

 

बातिलों में वज़्न कितना ?झूठ की औकात कितनी ?

क्यों अन्धेरों में सुलह से रौशनी घबरा रही है

                 ***************

मौलिक एवँ अप्रकाशित्

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 27, 2013 at 5:30pm

आदरणीया मंजरी जी , उत्साह वर्धन के लिये आपको बहुत बहुत धन्यवाद , आभार  !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 27, 2013 at 5:27pm

आदरणीय सौरभ भाई , आपने सही बताया , आदरणीय वीनस भाई ने भी यही कहा है , आगे से ध्यान रखूंगा ,दोष को  समझ लिया हूँ !

आपका बहुत बहुत आभार , आपके मार्ग दर्शन की ज़रूरत हमेशा रहेगी !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 27, 2013 at 3:35pm

एक बड़ा प्यारा सा ऐब है तकाबुले रदीफ़. उसे देख लीजियेगा, भाईजी.

वैसे आपकी कहन में जान है. शिल्प आदि की परेशानी शुरुआती दौर की चीज़ें हैं ..

शुभ-शुभ

Comment by mrs manjari pandey on August 25, 2013 at 2:53pm

बेख़याली मे कहीं हम हद के बाहर तो नहीं है

आदमीयत आज बैठी क्यूँ यहां शर्मा रही है    आदरणीय गिरिराज भन्डारी जी वक्त सोच विचार का है . बिलकुल सही फ़रमाया आपने. बहुत बहुत बधाई .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 25, 2013 at 11:00am

आदरणीय , आशुतोष आपकी सराहना मेरे लिये  उत्साह वर्धन का कारक है !! दिली आभार !!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 25, 2013 at 9:08am

आदरनीय गिरिराज जी ..हर शेर अपने आप में बिशिस्त 

दोस्त मेरे भूख ज्यादा आज ही क्यों लग रही है

जब मुझे कुछ और ज़्यादा जेब भी तरसा रही है

 

अश्क मेरी आंख से बहना ही क्या काफ़ी नही था

क्यूँ  ये बदली आज पानी इस तरह बरसा रही है...ये शेर मुझे बेहद पसंद आये ...ढेरों बधाई के साथ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 24, 2013 at 10:38pm

आदरणीय डा. प्राची जी आपने सही कहा है , जहां गलतियां है , सुधार करूंगा !!  आपकी सरहाना  के लिये तहे दिल से शुक्रिया !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 24, 2013 at 10:30pm

आदरणीय ,विजय भाई जी , सुधी जनो की सराहना सच मे हिम्मत देती है , आपका बहुर आभार !!

Comment by vijay nikore on August 24, 2013 at 7:43pm

आदरणीय गिरिराज जी:

 

गज़ल के सभी अश’आर अच्छे लगे। हार्दिक बधाई।

 

सादर,

विजय  निकोर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 24, 2013 at 2:38pm

क्या हवायें आज कुछ पैग़ाम ले के आ रही है. ..........हवाएं बहुत वचन और है एक वचन ?? क्या हवा भी आज कुछ पैगाम लेकर आ रही है ...ऐसे किया जा सकता है

धूप भी कुछ गा रही है, छाँव भी इतरा रही है

 

बेख़याली मे कहीं हम हद के बाहर तो नहीं है  .......यहाँ भी है की जगह हैं होना चाहिये 

आदमीयत आज बैठी क्यूँ यहां शर्मा रही है....................बहुत शानदार कथ्य , वाह !

 

इस जगह पर तो ख़िज़ां ने भी बहारें ओढ़ ली है

इसलिये ही ज़िन्दगी हर बार धोखा खा रही है

 

गुफ़्तगू  कुछ तो मोहब्बत और नफ़रत मे चली है 

वो भी कुछ समझा रही है ये भी कुछ समझा रही है.........वाह वाह ! वाह वाह ! 

 

दोस्त मेरे भूख ज्यादा आज ही क्यों लग रही है

जब मुझे कुछ और ज़्यादा जेब भी तरसा रही है................. क्या बात कही है, शानदार 

 

अश्क मेरी आंख से बहना ही क्या काफ़ी नही था

क्यूँ  ये बदली आज पानी इस तरह बरसा रही है ....उफ्फ ! बहुत खूब 

 

बातिलों में वज़्न कितना ?झूठ की औकात कितनी ?

क्यों अन्धेरों में सुलह से रौशनी घबरा रही है........वाह वाह !

इस शानदार गज़ल पर हार्दिक बधाई पेश है आ० गिरिराज भंडारी जी

सादर.

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