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ग़ज़ल : कोई चले न जोर तो जूता निकालिये

बह्र : मफऊलु फायलातु मफाईलु फायलुन (221 2121 1221 212)

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चंदा स्वयं हो चोर तो जूता निकालिये

सूरज करे न भोर तो जूता निकालिये

 

वेतन है ठीक  साब का भत्ते भी ठीक हैं

फिर भी हों घूसखोर तो जूता निकालिये

 

देने में ढील कोई बुराई नहीं मगर

कर काटती हो डोर तो जूता निकालिये 

 

जिनको चुना है आपने करने के लिए काम

करते हों सिर्फ़ शोर तो जूता निकालिये

 

हड़ताल, शांतिपूर्ण प्रदर्शन, जूलूस तक

कोई चले न जोर तो जूता निकालिये

---------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 25, 2013 at 9:16pm

बहुत बहुत धन्यवाद जितेन्द्र 'गीत' जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 25, 2013 at 9:15pm

बहुत बहुत शुक्रिया गीतिका 'वेदिका' जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 25, 2013 at 9:14pm

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ by अभिनव जी, स्नेह यूँ ही बना रहे

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 25, 2013 at 9:11pm

बहुत बहुत धन्यवाद Lata tej जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 25, 2013 at 9:11pm

बहुत बहुत धन्यवाद नादिर ख़ान साहब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 25, 2013 at 9:06pm

बहुत बहुत धन्यवाद Vinita Shukla जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 25, 2013 at 9:05pm

बहुत बहुत धन्यवाद Shyam Narain Verma जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 25, 2013 at 9:04pm

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ पियुष द्विवेदी 'भारत' जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 25, 2013 at 9:04pm

बहुत बहुत धन्यवाद Sarita Bhatia जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 25, 2013 at 9:04pm

बहुत बहुत शुक्रिया ram shiromani pathak जी

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