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सुखद स्मृतियाँ

दुमहले के ऊँचे वातायन से

हलके पदचापों सहित  

चुपके से होती प्रविष्ट

मखमली अंगों में समेट

कर देती निहाल

स्वयं में समाकर एकाकार कर लेती

घुल जाता मेरा अस्तित्व

पानी में रंग की तरह

अम्बर के अलगनी पर

टांग दिए हैं वक्त ने काले मेघ

चन्द्रमा आवृत है , ज्योत्सना बाधित

अस्निग्ध हाड़ जल रहा

सीली लकड़ियों की तरह

स्मृति मञ्जूषा में तह कर रखी हुई हैं

सुखद स्मृतियाँ.....

.. नीरज कुमार ‘नीर’

पूर्णतः मौलिक एवं अप्रकाशित ..

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Comment

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Comment by Neeraj Neer on September 1, 2013 at 9:20am

हार्दिक आभार आदरणीय वीनस केसरी जी .. 

Comment by वीनस केसरी on September 1, 2013 at 2:12am

वाह ...
अद्धुत रचना ....

Comment by Pradeep Kumar Shukla on August 29, 2013 at 1:49pm

waah Neeraj ji waah .... bahut khoob ..... badhai

Comment by Pradeep Kumar Shukla on August 29, 2013 at 1:48pm

waah Neeraj ji waah .... bahut khoob ..... badhai

Comment by Neeraj Neer on August 28, 2013 at 8:10pm

आदरणीय श्याम जुनेजा जी बहुत आभार . कविता के प्रति गंभीरता के लिए विशेष शुक्रगुजार हूँ . हाड का सबंध शरीर से है .. अस्निग्ध - प्रेमहीन , प्रेम से वंचित . सीली यानि पानी में गीली लकड़ियाँ जो धीरे धीरे सुलगती है और जलती है .  उम्मीद करता हूँ बातें अब कुछ ज्यादा स्पष्ट हुई होंगी . आपका धन्यवाद . 

Comment by Neeraj Neer on August 27, 2013 at 7:13pm

आदरणीय मीना पाठक जी , अरुण जी एवं विशाल चर्चित जी बहुत बहुत आभार ..

Comment by Neeraj Neer on August 27, 2013 at 7:11pm

आदरणीय सौरव जी ह्रदय से आभार .. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 27, 2013 at 3:13am

झिहर-झिहर बरसती झींसियों के आप्लावित साम्राज्य से मानों यह बिम्ब सीधा उतार लिया गया है --

अम्बर के अलगनी पर

टांग दिए हैं वक्त ने काले मेघ

चन्द्रमा आवृत है , ज्योत्सना बाधित

वाह आदरणीय वाह !

शुभ-शुभ

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 26, 2013 at 4:11pm

वाह नीरज भाई बहुत सुन्दर प्रस्तुति गहरे भाव बहुत बहुत बधाई स्वीकारें

Comment by Meena Pathak on August 26, 2013 at 10:15am

बहुत सुन्दर रचना .... बधाई स्वीकारें 
सादर 

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