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राम रम में घोलकर वो /लिख रहे चौपाईयां

राम रम में घोलकर वो

लिख रहे चौपाईयां

कोंपले, कत्‍थई, गुलाबी

औ हरी पुरवाईयाँ

पा भभूति हो चली हैं

पेट वाली दाईयाँ

खोल मुँह बैठा कमंडल

सुरसरि की आस में

ध्‍यान भी, करता यजन भी

डामरी उल्‍लास में

पर सरफिरा हाकिम समझता

खिज्र की रानाईयाँ

चूडि़याँ टुन से टुनककर

छन से पड़ी जिस होम में

बड़ा असर रखता गोसाईं

नीरो के उस रोम में

नरमेध के इस अश्‍व को

यह रेशमी विश्‍वास है

नर हैं सभी पंगु मगर

मादा सहज, गौ ग्रास है

फर्क है पड़ता किसे अब

कितनी कटी कलाईयाँ

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by राजेश 'मृदु' on August 30, 2013 at 3:14pm

आदरणीय वंदना तिवारी जी, केवल जी,जितेन्‍द्र जी, वंदना जी एवं गिरिराज जी, आप सबका आभारी हूं, सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 30, 2013 at 11:56am

अति सुन्दर !! राजेश भाई , बहुत बधाई !!

Comment by vandana on August 30, 2013 at 7:06am

बहुत बढ़िया रचना ....बहुत बहुत बधाई आदरणीय राजेश जी 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 30, 2013 at 12:21am

अति सुंदर चित्रण, बहुत बहुत बधाई आदरणीय राजेश जी

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 29, 2013 at 8:52pm

आ0 राजेश भाई जी, वाह! नए तेवर के साथ सुन्दर रचना। हृदयतल से हार्दिक बधाई। सादर,

Comment by रविकर on August 29, 2013 at 8:07pm

क्या बात है भाई
रचाई
खूबसूरत गीतिका -


शामिल हकीकत
रम रमण की
दुष्ट दुर्जन ही टिका-

Comment by Vindu Babu on August 29, 2013 at 6:55pm
आदरणीय राजेश जी नमस्कार!
यथार्थ का चित्रण करती हुई सुन्दर रचना बन पड़ी है।
सादर बधाई स्वीकारें आदरणीय।
सादर

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