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वेद महान सुज्ञान सुनो उसमे सब विश्व रहस्य समाहित
किन्तु उपेक्षित से लगते अवमूल्यन नैतिकता दिखता नित
कोश न पुण्य प्रसून रहे कितना करते तुम पाप उपार्जित
जीवन में असुरत्व बढ़ा व कुतर्क बड़ा अब धर्म पड़ा चित

विश्व सनातन धर्म गहे मत त्याग इसे अपना कर भारत!
खोज महागुरु भी निज के हित ज्ञान स्वकोश बना कर भारत!
छोड़ विकार सभी मन के तन को तपनिष्ठ घना कर भारत!
इन्द्र रहें हवि से बलवान स्वपौरुष की रचना कर भारत!

रचनाकार - डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

पूर्णतः मौलिक एवं अप्रकाशित रचना 

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Comment by ram shiromani pathak on September 5, 2013 at 8:19pm

बहुत ही सुन्दर छंद आदरणीय आशुतोष जी , हार्दिक बधाई आपको   //सादर  

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 5, 2013 at 7:26pm

प्रस्तुति यह सद्भाव भरी इससे भी आगे मुझको कहना 

कोष पुण्य भरे ऋणात्मक करते कितना पाप उपार्जित - लक्ष्मण 

सुन्दर प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई के साथ ही शिक्षक दिवस की शुभकामनाए 

Comment by annapurna bajpai on September 5, 2013 at 7:15pm

आ0 आशुतोष जी आपके छंदों का कोई जवाब नहीं । 

Comment by Dr Ashutosh Vajpeyee on September 5, 2013 at 6:51pm

मै धन्य हो गया रविकर जी बहुत बहुत आभार 

Comment by Dr Ashutosh Vajpeyee on September 5, 2013 at 6:50pm

बहुत बहुत आभार श्याम नारायण जी 

Comment by रविकर on September 5, 2013 at 5:23pm

स्वागत है आदरणीय-
(दिनेश चन्द्र गुप्ता "रविकर")

खूब रचें अशुतोष महाशय छंद विधा पर नाज हमें है |
प्रस्तुति है त्रुटिहीन प्रभो गुरु भाव भरे दृग-युग्म थमे हैं ||

Comment by Shyam Narain Verma on September 5, 2013 at 4:26pm

 इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ....

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