For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")


जीवन है क्या ?
मन के यक्ष प्रश्न
सुख या दुख ।

मेरा मन
पथ भूला राही है,
जग भवर ।
        
देख दुनिया,
जीने का मन नही,
स्वार्थ के नाते ।

मन भरा है,
 ऐसी मिली सौगात,
बेवाफाई का ।

कैसा है धोखा,
अपने ही पराये,
मित्र ही शत्रु ।

जग मे तु भी,
एक रंग से पूता,
कहां है जुदा ?

क्यों रोता है ?
सिक्के के दो पहलू
होगी सुबह ।

........‘रमेश‘.........
मौलिक अप्रकाशित

Views: 415

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by रमेश कुमार चौहान on September 11, 2013 at 11:30pm
परम श्रद्वेय प्राचीजी आपके शिल्पगत परख से मै अभिभूत हूं । आपके द्वारा चिन्हांकित त्रुटि यथार्थ है केवल ''मेरा मनवा के स्थन पर मेरा मन" टंकण त्रुटि है । शेष पर मेरा ध्यान नही था । आपके इस ध्यानाकर्षण्‍ा के लिये मै ह़दय से आपका आभरी हू । इस दिशा निर्देश से निश्चित रूप से मेरे त्रुटियां का निराकरण होगा । आप इसी आकार नि:संकोच मेरा मार्गदर्शन करते रहिगा । सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 11, 2013 at 4:16pm

बहुत सुन्दर हायकू प्रयास आ० रमेश चौहान जी 

जीवन है क्या ?
मन के यक्ष प्रश्न
सुख या दुख ।.............बहुत सुन्दर 

मेरा मन..........................सिर्फ ४ वर्णाक्षर 
पथ भूला राही है,.................................पंक्ति पहली पंक्ति पर निर्भर है 
जग भवर ।.......भँवर

मन भरा है,
ऐसी मिली सौगात,
बेवाफाई का   .........मिली के साथ 'का' या 'की'................... तीसरी पंक्ति स्वतंत्र नहीं है 

इस सद् प्रयास के लिए शुभकामनाएँ 

Comment by रमेश कुमार चौहान on September 10, 2013 at 9:58pm

आ.गिरिराज भंडारीजी, वंदना तिवारीजी, मीना पाठकजी,विजयश्रीजी आपलोगों के उत्साहवर्धन से मुझे नई शक्ति प्राप्त हुई ।  आप सभ सम्मानीय जनों का आभार  । सादर

Comment by vijayashree on September 10, 2013 at 12:38pm

क्यों रोता है ?
सिक्के के दो पहलू
होगी सुबह ।

सुदर हाइकू रमेश कुमार जी बधाई स्वीकारे 

Comment by Meena Pathak on September 9, 2013 at 11:09pm

सुन्दर हाइकू ... बधाई

Comment by Vindu Babu on September 9, 2013 at 6:31pm
वाह आदरणीय!
हर हाइकू एक से बछकर एक,ढेर सी सार्थकता समेटे हुए।
सादर बधाई इस गहन अभिव्यक्ति के लिए।
सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 9, 2013 at 9:42am
क्यों रोता है ?
सिक्के के दो पहलू
होगी सुबह । -------------- वाह वा !!! रमेश भाई बधाई !! बढ़िया हाईकू !!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

*दोहा*बरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।।*चौपाई*वह फुहार वह साथ…See More
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Tuesday
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Tuesday
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Saturday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Jul 9
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service