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कि तुझसे हो के, हर एक शेर हर ग़ज़ल गुज़रे...

कुछ इस तरह से, मेरी ज़िन्दगी का पल गुज़रे ।
ह्रदय की पीर, मेरे आंसुओं में ढल गुज़रे ।।

तुझे मै देख के लिक्खूं , या सोच के लिक्खूं ।
कि तुझसे हो के, हर एक शेर हर ग़ज़ल गुज़रे ।।

यूँ तो एक रोज़ गुज़ारना है दिल की धड़कन को ।
पर तुझे देख के धडके, धड़क के दिल गुज़रे ।।

वो तेरा दर की जहाँ हम बिछड़ गए थे कभी ।
हो के हर रोज़ उसी दर से, ये पागल गुज़रे ।।

वो एक दिन की वीर खुशियों का सिकंदर था ।
ये एक दिन, की तेरे गम में रो के पल गुज़रे ।।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Dr Lalit Kumar Singh on September 13, 2013 at 7:09pm

1212       1212       1212          22

कुछ इस तरह से, मेरी ज़िन्दगी का पल गुज़रे । 

1212         1212          12 12          22
ह्रदय की पीर, मेरे आंसुओं में ढल गुज़रे ।।

1212         1122         1212           22 

तुझे मै देख के लिक्खूं , या सोच के लिक्खूं ।

1212         1222         1212          22
कि तुझसे हो के, हर एक शेर हर ग़ज़ल गुज़रे ।।

2122                     1121             2121    222     

यूँ तो एक रोज़ गुज़ारना है दिल की धड़कन को ।
पर तुझे देख के धडके, धड़क के दिल गुज़रे ।।

वो तेरा दर की जहाँ हम बिछड़ गए थे कभी ।
हो के हर रोज़ उसी दर से, ये पागल गुज़रे ।।

वो एक दिन की वीर खुशियों का सिकंदर था ।
ये एक दिन, की तेरे गम में रो के पल गुज़रे ।।

प्रिय भाई, आपकी ग़ज़ल बहुत मिहनत के बाद बनी होगी, मानता हूँ. लेकिन पढने में अटकाव इतना जियादा है की मज़ा किरकिरा हो जाता है. मात्राएँ भी बहुत गिरानी पड़ती है. कई जगह तो बहर में आ नहीं पता. कृपया मार्ग दर्शन करें.

यूँ तो एक रोज़ गुज़ारना है दिल की धड़कन को- -- मिस्ररा सही अर्थ नहीं दे रहा. पहली बात तो धड़कन लिखने से दिल का ही बोध होता है. इसलिए दिल लिखना जरूरी नहीं है और दूसरी बात दिल की धडकन बंद होती है गुजरती नहीं है   
वो एक दिन की वीर खुशियों का सिकंदर था – वीर और सिकंदर के बीच की दूरी खटकती है

पर तुझे देख के धडके, धड़क के दिल गुज़रे – इस मिसरे में “क” का तकरार(तानाफुर सौती ) बहुत है गुस्ताखी माफ़

मैंने इसे दूसरी बहर पर सजाने की कोशिश की है. शायद पसंद आये

२२१      २१२१       १२२१       २१२

तेरा दर्द मेरे दिल से गुजर  जाए इस  तरह = तर दर द  मेर दिल स   गु जर जा य   इस त रह

इस जिंदगी का पल यूँ संवर जाए इस तरह 

Comment by बृजेश नीरज on September 13, 2013 at 12:30pm

बहुत सुन्दर भाव! आपको हार्दिक बधाई!
आपकी रचना बहर में तो नहीं लगती। कृपया मार्गदर्शन करें।

Comment by vandana on September 13, 2013 at 6:22am

सुन्दर भाव !!!

Comment by Parveen Malik on September 12, 2013 at 9:58pm
सुंदर भावों से सजी गजल ... बधाई !
Comment by डॉ. अनुराग सैनी on September 12, 2013 at 4:41pm

दिल की भावनाओ का एक बेहतरीन ज्वार , बधाई आपको 

Comment by rajveer singh chouhan on September 12, 2013 at 2:34pm


यूँ तो एक रोज़ गुज़ारना है दिल की धड़कन को ।
पर तुझे देख के धडके, धड़क के दिल गुज़रे ।।

बधाई हो श्रीमान्

 बहूत ही सुन्दर रचना

कृपया ध्यान दे...

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