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रोना -हंसना,कभी चिल्लाना,कभी ख़ुशी -कभी गम.
सारी दुनिया दंग रह गई, देख के दस का दम.
उठा खलीफा बुर्ज़ जहाँ में, शाने ईमारत बनकर. 
तो गिरा ईमारत दिल्ली में, एक कयामत बनकर.
भारत के रुपया को दस में, नया रूप-परिधान मिला.
अखिल विश्व की पांचवी मुद्रा, का उसको सम्मान मिला.
कभी किया दिल बाग-बाग,तो कभी किया बेदम.
सारी दुनिया दंग रह गई,देख के दस का दम.
चिकन- गोश्त में प्याज डालते, ये है कल की बात.
आज प्याज में गोश्त डालते, दस की ये करामात.
खोज रही है हर दुकानें, खरीदारों की बाट.
इंधन महँगा- वाहन सस्ता, ये है दस का ठाट.
महंगाई तो बन बैठी , धनवानों की बेगम.                                                                                                                     सारी दुनिया दंग रह गई,देख के दस का दम.
घोटालों के जाल में फंस गया,बूरी तरह से देश.
स्पैक्ट्रम- आदर्श सोसाइटी,चाहे कॉमनवेल्थ.
चल नहीं पाया लोकसभा का,शीतकाल का सत्र.
वहीँ एन.डी.ए.का बिहार में,राज हुआ एकछत्र.
आइये विदा करें हम दस को, ग्यारह का वेलकम.
सारी दुनिया दंग रह गई, देख के दस का दम.
                                    गीतकार- सतीश मापतपुरी

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Comment

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Comment by satish mapatpuri on December 29, 2010 at 4:47pm
हौसला अफजाई के लिए लताजी और गुरूजी, मैं आप दोनों को साधुवाद देता हूँ. 
Comment by Rash Bihari Ravi on December 29, 2010 at 4:14pm
bah bhai bah bahut khub
Comment by Lata R.Ojha on December 29, 2010 at 3:53pm
वाह ..बेहतरीन ..कितनी खूबी से समेटा है आपने पूरे वर्ष चली गतिविधियों को . हम भी रह गये दंग पढ़ के   :)

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