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ग़ज़ल : जब प्रतीक्षा में पड़ा था मौत के

बह्र -- रमल मुसद्दस महजूफ

२१२२, २१२२, २१२

मैं पपीहा प्यास में मरता रहा,
स्वाति मुझको जानकर छलता रहा,

सर्द गर्मी धूप हो या छाँव हो,
कारवां चलता चला चलता रहा,

श्राप ही ऐसा मिला था सूर्य को,
देवता होकर सदा जलता रहा,

धूल लेकर चल रहीं थी आंधियां,
आँख मैं मलता चला मलता रहा,

बात मन की मन ही मन में रह गई,
दर्द भीतर रोग बन पलता रहा,

जब प्रतीक्षा में पड़ा था मौत के,
वक़्त मुझको वो बड़ा खलता रहा...

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on September 25, 2013 at 2:31pm

श्राप ही ऐसा मिला था सूर्य को,
देवता होकर सदा जलता रहा,// क्या बात है आदर्णीय अरुन जी, खूब कहा। बधाई।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 24, 2013 at 8:13pm

प्रिय अरुण 

सुन्दर अशआर कहे हैं 

पर इता देश पर गौर ज़रूर करें क्योंकि इसके अनुसार काफिया ही गलत हो रहा है..

शुभकामनाएँ 

Comment by वीनस केसरी on September 21, 2013 at 10:30pm

अरुण अनंत भाई ग़ज़ल पर देर से आ पा रहा हूँ ...
काफी टिप्पणियां आ चुकी हैं और रदीफ़ भी बदल गई मगर एक बड़े दोष की ओर शायद किसी का ध्यान नहीं गया

आपको पता ही होगा काफ़िया के मूल शब्द में बढ़ा हुआ अंश यदि एक है तो रदीफ़ का हिस्सा माना जाता है

मरता छलता में ता रदीफ़ का हिस्सा हो गया अब मर छल को तो काफ़िया नहीं माना जा सकता !!!

ग़ज़ल में बड़ी इता का ऐब है जिसके करण ग़ज़ल में काफ़िया नदारद है ...
और काफ़िया का न होना ग़ज़ल में कितना संगीन जुर्म है ये आपको पता ही है ....

पुनः गौर फरमाएँ

Comment by Parveen Malik on September 20, 2013 at 3:04pm
अरुन जी बेहद खूबसूरत गजल ...
सादर बधाई स्वीकारें !

जब प्रतीक्षा में पड़ा था मौत के,
वक़्त मुझको वो बड़ा खलता रहा...
Comment by vandana on September 20, 2013 at 6:36am
श्राप ही ऐसा मिला था सूर्य को,
देवता होकर सदा जलता रहा,

बहुत शानदार ग़ज़ल आदरणीय अरुण जी
Comment by LOON KARAN CHHAJER on September 19, 2013 at 4:56pm

बहुत अच्छी रचना . हर लाइन अपना एक सन्देश दे रही है .
बात मन की मन ही मन में रह गई,
दर्द भीतर रोग बन पलता रहा,
वाह ! वाह ! इतनी सुन्दर रचना के लिए बधाई।

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 19, 2013 at 2:48pm

आप सभी का अनेक अनेक धन्यवाद आप सभी का कहना था कि चला को रहा करने से वाक्य विन्यास अच्छे लगेंगे तो वह बदलाव कर दिया है, इसी तरह के सहयोग की अपेक्षा सदैव रहेगी आप सभी से. एक बार पुनः आप सभी मित्रों का हृदयतल से हार्दिक आभार आशीष एवं स्नेह यूँ ही बनाये रखिये.

Comment by Dr Lalit Kumar Singh on September 19, 2013 at 5:39am

अरुन शर्मा 'अनन्त' भाई,
दौरे हाज़िर ग़ज़ल अच्छी लगी। बधाई।
अगर रदीफ़ को 'रहा' कर दिया जाये तो सारे वाक्य विन्यास ज्यादा अच्छे लगेंगे।ग़ज़ल में कहीं कोई कमी नहीं है
सादर शुभ शुभ

Comment by Abhinav Arun on September 19, 2013 at 4:22am

धूल लेकर चल रहीं थी आंधियां,
आँख मैं मलता चला मलता चला,

                ... सादगी और ताजगी लिए हुए है ये ग़ज़ल बधाई आ. अरुण जी !!

Comment by राज लाली बटाला on September 19, 2013 at 1:47am

बहुत बढ़िया ,हार्दिक बधाई

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