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ग़ज़ल:ना जाने हक़ीक़त है वहम है की फ़साना

मंज़िल पे खड़ा हो के सफ़र ढूँढ रहा हूँ
हूँ साए तले फिर भी शजर ढूँढ रहा हूँ

औरों से मफ़र ढूँढूं ये क़िस्मत कहाँ मेरी?
मैं खुद की निगाहों से मफ़र ढूँढ रहा हूँ 

दंगे बलात्कार क़त्ल-ओ-खून ही मिले
अख़बार मे खुशियों की खबर ढूँढ रहा हूँ

शोहरत की किताबों के ज़ख़ायर नही मतलूब
जो दिल को सुकूँ दे वो सतर ढूँढ रहा हूँ

ना जाने हक़ीक़त है वहम है की फ़साना 
वाक़िफ़ नही मंज़िल से मगर ढूँढ रहा हूँ

ये हिंदू का शहर है वो मुसलमान की बस्ती
बस वो ही नही मैं जो नगर ढूँढ रहा हूँ

माँ मुझको खिलौनों की नही कोई ज़रूरत
बस तेरी मोहब्बत की नज़र ढूँढ रहा हूँ


-सालिम शेख
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by saalim sheikh on September 19, 2013 at 3:16pm
2211 2211 2211 22
adarniya Aryn ji
Comment by अरुन 'अनन्त' on September 19, 2013 at 3:00pm

आदरणीय सालिम शेख भाई कृपया ग़ज़ल की बहर से अवगत करायें?

Comment by saalim sheikh on September 19, 2013 at 1:19pm
Bht shukriya mohtaram Giriraj sb
hausla afzai aur rahnumai ke liye,
ji mai abhi bhr se zada waqif nahi ho saka hun koshish jari hai, bas ap Gurujanon ke sath ki zarurat hai, aise hi sneh banay rakhen

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 19, 2013 at 1:12pm

आदरणीय सलीम भाई , बहुत शानदार ढ़ंग से बह्त अच्छी बाते कही आपने वाह वा !!! बधाई !!

ना जाने हक़ीक़त है वहम है की फ़साना 
वाक़िफ़ नही मंज़िल से मगर ढूँढ रहा हूँ

ये हिंदू का शहर है वो मुसलमान की बस्ती
बस वो ही नही मैं जो नगर ढूँढ रहा हूँ           ----------------- बहुत खूब !!

लेकिन आदरणीय बह्र मे कमियां हैं , जानकार बतायेंगे !! अलग अलग शेर मे मात्रा विन्यास अलग अलग लग रहा है !!

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