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Saalim sheikh's Blog (16)

बस तेरी थोड़ी सी कमी होगी

ज़िन्दगी खत्म तो नहीं होगी

रूह भी जिस्म में कहीं होगी 

धड़कनें दिल मे ही बसी होगी

बस तेरी थोड़ी सी कमी होगी

ये शब ओ रोज़ यूं ही गुज़रेंगे

चाँद सूरज भी पाली बदलेंगे

धूप होगी और चांदनी होगी

बस तेरी थोड़ी सी कमी होगी

वक़्त मुझे भूलना सिखा देगा

फिर कोई आएगा, हंसा देगा 

बाद तेरे भी हर ख़ुशी होगी 

बस तेरी थोड़ी सी कमी होगी

याद धुँधली तो हो ही जाएगी

वो…

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Added by saalim sheikh on October 31, 2018 at 10:51pm — 3 Comments

जानाँ

बिना तेरे हर एक लम्हा मुझे दुशवार है जानाँ 

अगर ये प्यार है जानाँ, तो मुझको प्यार है जानाँ

हसीं चेहरे बहुत देखे फ़िदा होना भी मुमकिन था 

फ़िदा हो कर फ़ना होना ये पहली बार है जानाँ

हमें कहना नहीं आया ,और समझा भी नहीं तुमने 

मेरा हर लफ़्ज़ तुमसे प्यार का इज़हार है …

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Added by saalim sheikh on September 7, 2016 at 5:30am — 3 Comments

बोझ : नज़्म

थाम लो इन आंसुओं को

बह गए तो ज़ाया हो जाएंगे

इन्हें खंजर बना कर पेवस्त कर लो

अपने दिल के उस हिस्से में 

जहाँ संवेदनाएं जन्म लेती हैं

उसके काँधे पर रखी लाश से कहीं ज्यादा वज़न है

तुम्हारी उन संवेदनाओं की लाशों का 

जिन्हें अपने चार आंसुओं के कांधों पर 

ढोते आए हो तुम 

अब और हत्या मत करो इनकी

संवेदनाओं का कब्रस्तान बनते जा रहे तुम

हर ह्त्या, आत्महत्या, बलात्कार पर 

एक शवयात्रा निकलती है तुम्हारी आँखों…

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Added by saalim sheikh on August 26, 2016 at 1:00am — 4 Comments

मंज़र ( नज़्म )

अम्बर के दरीचों से फ़रिश्ते अब नहीं आते

न परियाँ आबशारों में नहाने को उतरती हैं

न बच्चों की हथेली पर कोई तितली ठहरती है

न बारिश की फुआरों में वो खुशियाँ अब बरसती हैं

सभी लम्हे सभी मंज़र बड़े बेनूर से हैं सब

मगर हाँ एक मंज़र है

जहां फूलों के हंसने की अदा महफूज़ है अब भी

जहाँ कलियों ने खिलने का सलीक़ा याद रखा है

जहां मासूमियत के रंग अभी मौजूद हैं सारे

वो मंज़र है मेरे हमदम

तुम्हारे मुस्कुराने का

- शेख…

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Added by saalim sheikh on July 5, 2016 at 4:21pm — 4 Comments

नज़्म - मेरी परी

हाँ वो ख्वाब हैं 

वो ख्वाब ही हैं जब तुम 

तख़य्युल के परों से उड़ते 

चाँद का नूर चुरा लाती हो 

और तोड़ कर बादलों के रेशमी टुकड़े 

गूंध कर उनको चांदनी में फिर 

किसी अनजान ज़मीं पर उसके 

महल तामीर किये हैं तुमने 

और उन महलों में बसा रखें हैं वो सारे मंज़र 

जो हक़ीक़त में बदल जाएं तो 

दर्द दुनिया से चले जाएं हमेशा के लिए

हाँ वो ख्वाब हैं जब तुम 

चेहरे पे हवाओं की शोखियाँ…

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Added by saalim sheikh on May 22, 2016 at 11:37am — 3 Comments

नज़्म - तुम्हारे ख़त

कितना अच्छा होता न ?

अगर वो सारे ख़त तुम्हारे

जिन्हें मैं रोज़ पढ़ता हूँ

पढ़ कर मुस्कुराता हूँ

कभी आंसू भी आते हैं

मगर गिरने नहीं देता

कि कोई लफ्ज़ जो तुमने लिखा

मिट जाए न मेरे आंसू से

कितना अच्छा होता

जो ये सारे ख़त तुम्हारे

तुमने न लिखे होते

या मेरा पता गलत होता

तो आज जब तुम अहद सारे भूल बैठे हो

मैं भी भूल सकता था

सभी क़समें सभी वादे

सभी शिकवे सभी आहें

जो हैं जा ब जा बिखरे हुए

हर एक ख़त की भीगी सत्रों में

और जो… Continue

Added by saalim sheikh on May 8, 2016 at 11:41pm — 5 Comments

ग़ज़ल : लब-ओ-अरिज़ की, वफ़ा और जफ़ा की बातें

लब-ओ-अरिज़ की, वफ़ा और जफ़ा की बातें
नाज़-ए-महबूब की, क़ामत की, अदा की बातें
.
जलव-ए-वस्ल की, फुरक़त की,सज़ा की बातें
दिल-ए-बेहोश, फिर एक होशरुबा की बातें
.
हैं कहाँ इश्क़-ओ-वफ़ा ,…
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Added by saalim sheikh on August 3, 2015 at 8:00pm — 15 Comments

क़ातिल का मज़हब (लघुकथा )

आज एक महीना होने को आया था और क़लम ऐसी जड़ हुई थी कि आगे बढ़ने का नाम ही ना लेतीI

 ऐसा उसके साथ पहले भी कई बार हुआ था ,कि वो लिखने बैठता और पूरा पूरा दिन गुज़र जाने पर भी काग़ज़ कोरा रह जाता, लेकिन यहाँ बात कुछ और ही थी ,आज खयालात उसके साथ कोई खेल नहीं खेल रहे थे , वो जानता था कि उसे क्या लिखना है ,कहानी के सारे किरदार उसके ज़हन में मौजूद थे I

वो बूढी मज़लूम औरत , वो भोली सी कमसिन बच्ची , वो सफ्फ़ाक आँखों वाला बेरहम क़ातिल , सारे किरदार उसकी आँखों के सामने…

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Added by saalim sheikh on July 22, 2015 at 2:00pm — 26 Comments

ग़ज़ल : हमारा प्यार आँखों से अयाँ हो जायगा एक दिन

हमारा  प्यार आँखों से अयाँ हो जाएगा इक  दिन 

छुपाना लाख चाहोगे बयाँ हो जाएगा इक दिन 

ये सब वहशत-ज़दा रातें इसी उम्मीद में गुज़रीं 

कि तुम आओगे , रौशन ये  समां हो जाएगा इक दिन 

न टूटे दिल  , न तन्हा रात , न भीगी  हुई पलकें 

मगर सब छीन कर बचपन,जवां हो जाएगा इक दिन 

तुम्हारे सुर्ख होठों की महक में ऐसा जादू है 

कि भवरों को भी फूलों का गुमाँ हो जाएगा इक दिन 

लिखो बस  गीत उल्फ़त के और नग्मे प्यार के…

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Added by saalim sheikh on June 29, 2015 at 11:30am — 19 Comments

नज़्म: सवाल

एक तवील ख़ामोशी

ज़हन के दरीचे में

ख़ामोशी ज़बाँ की नहीं

ख़ामोशी ख्यालों की

ज़हन में जो उठते थे

उन सभी सवालों की

सवाल कुछ हैं दुनिया से

जवाब जिनके मिलने की

उम्मीद छोड़ दी मैंने

सवाल कुछ है अपनों से

जवाब जिनके मालुम हैं

पर उन्ही से सुनने हैं

सवाल कुछ हैं खुद से भी

सवाल हर एक लम्हे का

ज़िन्दगी के सफ्हे पर

जो गुज़र गया पहले

या गुजरने वाला है

क्या वो दे गया मुझको

बजुज़ चंद और सवालों के

जवाब जिनके मिलने तक…

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Added by saalim sheikh on June 4, 2015 at 1:40pm — 11 Comments

कविता : अमन

मेरा मज़हब सच्चा है

अमन सिखाता है

खूंरेजी से नफरत है हमें

और नाज़ है मुझे अपने मज़हब पर

कुछ लोग फैलाते हैं झूठी सच्ची कहानियां

कि हम दुश्मन हैं अमन के

कि हम नफरतें बांटते हैं

कि हमें क़द्र नहीं इंसानी जानों की

क़सम है मुझे अपने पुर अम्न मज़हब की

जो मुझे मिल जाएँ वो लोग जो फैलातें हैं ये…

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Added by saalim sheikh on May 25, 2015 at 11:51am — 3 Comments

ग़ज़ल

हूँ महफ़िलों में तन्हा, खुद की नज़र में रुस्वा

हर एक रंग फीका , हर एक शै फसुर्दा



आवाज़ें दोस्तों की ,मुझ से नहीं हैं गोया

ज़िंदा दिली भी जैसे , करती है मुझ से पर्दा



क्या ग़म है ज़िन्दगी में , तुमको बताऊँ कैसे

अब तक हुआ नहीं है , ये राज़ मुझे पे अफ़्शाँ



उलझन है कैसी दिल की ? उलझन यही है मुझको

रंग ज़िन्दगी से रूठे , दिल भी रंगों से रूठा…

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Added by saalim sheikh on December 10, 2014 at 3:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल : जिया गुमनाम हूँ तो मौत को तशहीर मत देना

नए ज़हनों को छूने दो अदब के अनछुए पहलू

इन्हे मीरास में उलझी हुई ज़न्जीर मत देना

लबों को सी लिया मैने,खुदा ये बस में था मेरे

जो आहें दिल से उठ जाएं उन्हें तासीर मत देना

नई है नस्ल नई जंगें नए हथियार भी होंगे

क़लम दो मुल्क के हाथों में अब शमशीर मत देना

मचल जाए ना मेरी रूह फिर दुनिया में आने को

जिया गुमनाम हूँ तो मौत को तशहीर मत देना

रहूँ मैं मुन्हसिर दीदार…

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Added by saalim sheikh on September 16, 2014 at 1:30pm — 13 Comments

ग़ज़ल:ना जाने हक़ीक़त है वहम है की फ़साना

मंज़िल पे खड़ा हो के सफ़र ढूँढ रहा हूँ

हूँ साए तले फिर भी शजर ढूँढ रहा हूँ

औरों से मफ़र ढूँढूं ये क़िस्मत कहाँ मेरी?

मैं खुद की निगाहों से मफ़र ढूँढ रहा हूँ 

दंगे बलात्कार क़त्ल-ओ-खून ही मिले

अख़बार मे खुशियों की खबर ढूँढ रहा हूँ

शोहरत की किताबों के ज़ख़ायर नही मतलूब

जो दिल को सुकूँ दे वो सतर ढूँढ रहा हूँ

ना जाने हक़ीक़त है वहम है की फ़साना 

वाक़िफ़ नही मंज़िल से मगर ढूँढ रहा हूँ

ये हिंदू का शहर है…

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Added by saalim sheikh on September 18, 2013 at 5:32pm — 14 Comments

ग़ज़ल:मुजरिम मैं नहीं,पर मुफ़लिसी..........

मुजरिम मैं नहीं पर मुफ़लिसी गोयाई छीन लेती है
दौलत आज भी इन्साफ की बीनाई छीन लेती है

हैं जौहर आज भी मुझ में वही तेवर भी हैं लेकिन
सियासत अब मेरे हाथों से रोशनाई छीन लेती है

नफरत थक गयी दामन मेरा मैला न कर पाई
मोहब्बत मेरे दामन से हर रुसवाई छीन लेती है

यही रहज़न कभी रहबर हुआ करता था बस्ती का
ग़रीबी रंग में आती है तो अच्छाई छीन लेती है


~सालिम शेख
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by saalim sheikh on September 15, 2013 at 10:02pm — 20 Comments

मरियम

वो जन्नत है,वो रहमत है,वो मेराज-ए-मोहब्बत है
समंदर मेँ कहाँ, जो माँ की ममता में है गहराई

उसी की तरबियत से इस चमन में फूल खिलते हैँ
बिना मरियम के क्या ईसा और ईसा की मसीहाई

-सालिम शेख

मौलिक व अप्रकाशित

Added by saalim sheikh on September 15, 2013 at 10:59am — 5 Comments

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