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कन्या पूजन -- लघु कथा

 उमा दादी ने जब बड़े प्यार से सभी कन्याओं को चरण धो धो कर जमीन पर बिछे आसन पर बैठाया और रोली कुमकुम का टीका लगा कर  सभी कन्याओं को चुनरी ओढ़ाई और भोजन परोस कर वही बगल मे हाथ जोड़ कर बैठ गईं - “भोजन जिमों मेरी माता रानी ।"

अचानक उनके बीच मे बैठी उमा दादी की पोती उठ खड़ी हुई  - “ आप गंदी हो दादी ! आज कितने प्यार से खिला रही हो रोज तो माँ को कहती हो बेटी पैदा करके रख दी । अब बताओ अगर बेटियाँ नहीं पैदा होती तो तुम कन्या कहाँ से लाती और किसको खिलाती, कैसे कन्या पूजन करती ?"

 

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by annapurna bajpai on September 26, 2013 at 5:20pm

आदरणीय कुशवाह जी इस मानसिकता को  बदलने की अवश्यकत है , आपने हमारी रचनाओं को समय दिया आपका हार्दिक आभार । 

Comment by annapurna bajpai on September 26, 2013 at 5:18pm

आदरणीया प्राची जी आपके कहने अनुसार प्रथम पंक्ति हटा दी है । आपका हार्दिक आभार । 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on September 26, 2013 at 3:44pm

पता नही हर महिला पुत्र की ही कामना क्यों करती है . 

बधाई. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 26, 2013 at 11:02am

इन दोहरे आवरणों को इंसान जाने कब तक ढोता रहेगा...

कन्याओं के प्रति अपनाए जाने वाले इस दोहरे रवैये को प्रस्तुत करती सुन्दर लघु कथा.

आ० शुभ्रांशु जी से सहमत हूँ, प्रथम पंक्ति का अर्धपूर्वांश हटा दिया जाए तो अंत का पंच जोर से महसूस होगा 

सादर.

Comment by annapurna bajpai on September 25, 2013 at 3:08pm

आदरणीय शुभ्रांशु पांडे जी आपका आभार । 

Comment by Shubhranshu Pandey on September 24, 2013 at 10:39pm

आदरणीय अन्न्पूर्णा जी,

ये तो वही बात हो गयी कि देश भक्त तो पैदा हों लेकिन पडो़स के घर में...

पूजा के लिये कन्या तो चाहिये लेकिन बाहर से. 

वैसे पहली लाइन की शुरुआत ने पूर्वाग्रही बना दिया. अन्त का पन्च धीमा हो गया..सुन्दर कथा.

सादर 

Comment by annapurna bajpai on September 23, 2013 at 1:33pm

आ0 आशीष जी आपका आभार ।

Comment by annapurna bajpai on September 23, 2013 at 1:32pm

आ0 अमन वर्मा जी यही विडिम्बना है । आपका आभार ।

Comment by annapurna bajpai on September 23, 2013 at 1:31pm

अक्सर ऐसा ही होता है गीतिका जी । आपका हार्दिक आभार ।

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on September 23, 2013 at 10:06am

सुन्दर रचना !

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