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उडो तुम व्योम के वितान में

पसारो पंख निर्भय .

अश्रु धार  से

नहीं हटेगी चट्टान                                                                                                                    

जो है जीवन की राह में

मार्ग अवरुद्ध किये,  खुशियों की .

गगन की ऊंचाई से

सब कुछ छोटा लगता है .

और तुम बड़े हो जाते हो.

बिस्तर की नमकीन चादर को

धुप दिखा कर 

फिर टांग दो परदे की तरह ..

 

पुर्णतः मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by रविकर on September 24, 2013 at 5:20pm

बढ़िया आदरणीय / बधाई-

बहा पसीना श्रम कठिन, तन मन दिया भिगोय |
चादर हो नमकीन जब, बन्दा उसपर सोय ||

Comment by annapurna bajpai on September 24, 2013 at 4:53pm

आदरणीय नीरज जी इस सुंदर संदेश युक्त रचना हेतु आपको बधाई ।

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on September 24, 2013 at 4:34pm

आदरणीया वंदना जी ने जो सवाल किया है वही मेरे मन में भी आया 

Comment by Vindu Babu on September 24, 2013 at 4:29pm
उड़ो तुम व्योम के वितान में
पसारो पंख निर्भय,
आंखो के उत्स से
नहीं हटेगी चट्टान।....बहुत सुन्दर!
'बिस्तर की नमकीन चादर' मतलब आदरणीय?
सादर
Comment by Meena Pathak on September 24, 2013 at 11:59am

बहुत सुन्दर  रचना ... बधाई आप को आदरणीय 

कृपया ध्यान दे...

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