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हाथ काटे जा चुके हैं फिर तू आंखें लाल कर ( ग़ज़ल ) गिरिराज भंडारी

2122     2122          2122            212

कोशिशों का अब कहीं नामों निशां रहता नहीं 

हाल अपना संग है वो ,जो कभी ढहता नहीं

हादसे कैसे भी हों कितने भी हों मंज़ूर सब

ख़ून अब बेजान आंखों से कभी बहता नहीं

मेरी क़िस्मत खोज कर के थक गयी मुझको वहाँ

जिन ठिकानो पर कभी मै भूल कर रहता नहीं

मुश्किलें खुद राह देंगीं रास्ते पर आ उतर  

ताल सड़ जाता है सुन ले, जो कभी बहता नहीं

हाथ काटे जा चुके हैं फिर तू आंखें लाल कर

आग सीने में अगर हो, चुप कभी सहता नहीं

मुश्किलों से इस क़दर तू आज रंजीदा न हो

कौन ऐसा सूर्य है , राहू जिसे गहता नही

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 1, 2013 at 8:27pm

आदरणीया प्राची जी , आपका मेरी गज़ल पर आना ही मेरा उत्साह वर्धन के लिये बहुत काफी है !! आपका बहुत आभार !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 1, 2013 at 8:25pm

आदरणीय रविकर भाई जी , रच्ना की सराहना के लिये आपका आभार !!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 1, 2013 at 8:24pm

आदरणीय अरुण भाई उत्साह वरधन के लिये आपको हार्दिक धन्यवाद , आभार !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 1, 2013 at 8:22pm

आदरणीय सन्दीप भाई , हौसला अफज़ाईके लिये आपका दिली शुक्रिया !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 1, 2013 at 8:21pm

आदरणीय विजय भाई . गज़ल की सराहना के लिये आपका बहुत बहुत आभार !!


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Comment by rajesh kumari on October 1, 2013 at 8:17pm

मुश्किलें खुद राह देंगीं रास्ते पर आ उतर  

ताल सड़ जाता है सुन ले, जो कभी बहता नहीं----बेहतरीन शेर हुआ वाह आदरणीय गिरिराज जी क्या कहने आपकी इस ग़ज़ल के ,बहुत अच्छी लगी दिली दाद कबूलें 

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 1, 2013 at 8:11pm

///हादसे कैसे भी हों कितने भी हों मंज़ूर सब

ख़ून अब बेजान आंखों से कभी बहता नहीं

मेरी क़िस्मत खोज कर के थक गयी मुझको वहाँ

जिन ठिकानो पर कभी मै भूल कर रहता नहीं/// वाह आदरणीय गिरिराज सर दिल को छूने वाले अशआर हैं दाद कुबूल करें

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 1, 2013 at 8:04pm

आदरणीय जीतेन्द्र भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका बहुत बहुत आभार !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 1, 2013 at 8:03pm

आदरणीय नीरज भाई , हौसला अफज़ाई के लिये आपका बहुत शुक्रिया !!

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on October 1, 2013 at 7:45pm

वाह !-वाह ! मन मोह लिया आपकी सुंदर गज़ल ने ! हार्दिक बधाई !

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