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क्या कहूँ .................. ( अन्नपूर्णा )

क्या कहूँ ...............

 

आहत मन की व्यथा

कैसे सुनाऊँ.................

मन की व्याकुलता 

अश्रु और व्याकुलता

साथी है परस्पर

आकुल होकर आँख भी

जब छलक जाती है

गरम अश्रुओं का लावा

कपोलों को झुलसा जाता है

न जाने कब कैसे ...................

पीर आँखों की राह

चल पड़ती है बिना कुछ कहे

आकुल मन बस यूं ही

तकता रह जाता है

भाव विहीन होकर भी

भाव पूर्ण बन जाता है जब

जिह्वा सुन्न हो जाती है तब

न जाने कब कैसे .........................

कुछ आरोपों की पोटली

फिर खुल गई

मन ने आरोपित किया

आँख को ,

फिर भर आई शायद

मन और आँख

साथी हैं परस्पर

क्या कहूँ .......................... अन्नपूर्णा बाजपेई

अप्रकाशित एवं मौलिक 

 

 

 

 

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Comment by annapurna bajpai on October 29, 2013 at 10:12pm

प्रिय महिमा आपका हार्दिक आभार । 

Comment by annapurna bajpai on October 29, 2013 at 10:11pm

आ0 प्राची जी आपको रचना पसंद आई मेरा लेखन सफल रहा , आपका हार्दिक आभार । 

Comment by MAHIMA SHREE on October 29, 2013 at 9:23pm

बेहद सुंदर भावाभिव्यक्ति... आ. अन्नपूर्ण जी  बधाई आपको


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 29, 2013 at 8:08pm

आदरणीया अन्नपूर्णा जी 

सही कहा..मन और आँखें परस्पर साथी है..

खुशी को, दर्द हो, जीत हो या हार... मन के हर एहसास को दर्शाती हैं आँखें और भावातिरेक में भीग जाती हैं.

सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई 

Comment by annapurna bajpai on October 25, 2013 at 6:34pm

आदरणीय सुशील जी आपका हार्दिक आभार । 

Comment by Sushil.Joshi on October 24, 2013 at 8:18pm

वाह..... बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति है आ0 अनुपमा जी......

मन और आँख

साथी हैं परस्पर

क्या कहूँ ................ बहुत बहुत बधाई इस कृति के लिए....

Comment by annapurna bajpai on October 24, 2013 at 6:44pm

आदरणीय बृजेश जी आपका हार्दिक आभार । 

Comment by annapurna bajpai on October 24, 2013 at 6:44pm

आदरणीय रएएम शिरोमणि जी आपका हार्दिक आभार । 

Comment by बृजेश नीरज on October 23, 2013 at 10:15pm

 सुन्दर रचना! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by ram shiromani pathak on October 23, 2013 at 8:24pm

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति आदरणीया अन्नपूर्णा जी ,हार्दिक बधाई आपको /

कृपया ध्यान दे...

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