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क्या कहूँ .................. ( अन्नपूर्णा )

क्या कहूँ ...............

 

आहत मन की व्यथा

कैसे सुनाऊँ.................

मन की व्याकुलता 

अश्रु और व्याकुलता

साथी है परस्पर

आकुल होकर आँख भी

जब छलक जाती है

गरम अश्रुओं का लावा

कपोलों को झुलसा जाता है

न जाने कब कैसे ...................

पीर आँखों की राह

चल पड़ती है बिना कुछ कहे

आकुल मन बस यूं ही

तकता रह जाता है

भाव विहीन होकर भी

भाव पूर्ण बन जाता है जब

जिह्वा सुन्न हो जाती है तब

न जाने कब कैसे .........................

कुछ आरोपों की पोटली

फिर खुल गई

मन ने आरोपित किया

आँख को ,

फिर भर आई शायद

मन और आँख

साथी हैं परस्पर

क्या कहूँ .......................... अन्नपूर्णा बाजपेई

अप्रकाशित एवं मौलिक 

 

 

 

 

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Comment

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Comment by डॉ. अनुराग सैनी on October 21, 2013 at 9:23pm

बहुत  बढ़िया अन्नपूर्णा जी , बहुत ही भावुक कर देने वाली रचना है 

Comment by annapurna bajpai on October 21, 2013 at 8:27pm

आदरणीय विजय जी , दीपक पांडे जी आपका हार्दिक आभार । 

Comment by DEEPAK PANDEY on October 21, 2013 at 8:08pm

Incredible thinking.......

Congratulation  

Comment by विजय मिश्र on October 21, 2013 at 6:48pm
आँखें और मन की आँखें जब एक ही भाषा सुनते ,समझते और बोलते हैं तब सचमुच वे अभिन्न मित्र की तरह एक-दूसरे को परस्पर बाँटते और सहेजते भी हैं . एक भावभारी रचना के लिए आभार अन्नपूर्णाजी .

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