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कभी आत्ममन्थन करना -- मीना पाठक

दिए दिन, महीने, बरस
जीवन के अनमोल पल
तुम्हारी तल्खियों से
आहत जख्मों को छुपा
मुस्कान की सौगात दी
कोमल भावनाएं
इच्छाओं की आहूति दी
कायम रखी
तुम्हारी मिल्कियत
वजूद को मिटा कर
फिर भी
तुम छीनते रहे मुझसे
मेरे हिस्से का वक्त
तुम्हें मंजूर नही
मेरा खुद के लिए
जीना
तृप्त ना हो सकीं
तुम्हारी इच्छाएं
छीन लेना चाहते हो
मेरा आस्तित्व
मेरी अभिलाषाएं
मेरा सब कुछ
हक से लेने वाले
कभी सोचा
तुमने मुझे क्या दिया ?
कभी आत्ममन्थन करना !!   

मीना पाठक
 
मौलिक/अप्रकाशित 

Views: 723

Comment

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Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on October 23, 2013 at 9:25pm

तुम छीनते रहे मुझसे
मेरे हिस्से का वक्त
तुम्हें मंजूर नही
मेरा खुद के लिए
जीना
तृप्त ना हो सकीं
तुम्हारी इच्छाएं
छीन लेना चाहते हो
मेरा आस्तित्व
मेरी अभिलाषाएं
मेरा सब कुछ
हक से लेने वाले
कभी सोचा
तुमने मुझे क्या दिया ?
कभी आत्ममन्थन करना

सही प्रश्न किआ है मीना जी आपने ......आपके भाव बहुत ही गहरे हैं और आपके दर्द कही उससे अधिक झलक रहा है ...बहुत बहुत बधाई /

Comment by ram shiromani pathak on October 23, 2013 at 8:12pm

बहुत ही सार्थक  प्रश्न छुपा है आपकी रचना में आदरणीया मीना  जी //हार्दिक बधाई आपको //सादर 

Comment by Meena Pathak on October 23, 2013 at 7:46pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय रमेश जी 

Comment by Meena Pathak on October 23, 2013 at 7:45pm

हार्दिक आभार आदरणीय अखिलेश कृष्ण जी | सादर 

Comment by रमेश कुमार चौहान on October 23, 2013 at 7:39pm

आदरणीय पाठकजी निश्चित ही यह रचना हमें आत्ममंथने करने विवश कर रही । सार्थक अभिव्यक्ति के लिये सादर साधुवाद

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 23, 2013 at 7:34pm

आपकी वेदना लाखों परिवार की सच्चाई है, बधाई आ. मीना पाठक जी  भावपूर्ण रचना के लिए।

Comment by Meena Pathak on October 23, 2013 at 6:48pm

अर्दिक आभार आ० अन्नपूर्णा जी 

Comment by annapurna bajpai on October 23, 2013 at 6:11pm

वाहहहह !!!!! आ0 मीना जी बहुत सुंदर भाव पूर्ण रचना बहुत बधाई आपको । 

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