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लगा अब दांव पर परिवार का सम्मान है /

1 2 2 2 1 2 2 2 1 2 2 2 1 2


लबों से आज गायब हो गई मुस्कान है
अजब सी अब परेशानी लिए इन्सान है /

कभी तो दिन भी बदलेंगे ,मिलेगा चैन तब
दुखों का अंत होगा तब यही अनुमान है /

गिले शिकवे यूँ अब हावी हुए रिश्तों पे हैं
लगा अब दांव पर परिवार का सम्मान है /

किसे अपना कहें किसको पराया हम कहें
यहाँ हर चेहरे की अब छुपी पहचान है /

रचे हैं साजिशें गहरी मगर अब सोचते
जफ़ा पाकर खुदी का डोलता ईमान है /

..............................................

...........मौलिक व अप्रकाशित.........

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Comment by Sarita Bhatia on November 4, 2013 at 7:05pm

आदरणीय वीनस जी तह दिल से शुक्रिया मार्गदर्शन बनाए रखें 

Comment by Sarita Bhatia on November 4, 2013 at 7:05pm

ब्रिजेश नीरज जी शुक्रिया 

Comment by Sarita Bhatia on November 4, 2013 at 7:04pm

आदरणीय राजेश जी हार्दिक आभार 

Comment by Sarita Bhatia on November 4, 2013 at 7:04pm

भाई राम जी उत्साहवर्धन करते रहें ,शुक्रिया 

Comment by Sarita Bhatia on November 4, 2013 at 7:03pm

आदरणीय अन्नपूर्णा जी हार्दिक आभार 

Comment by वीनस केसरी on November 2, 2013 at 11:34pm

एक और सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारें

Comment by बृजेश नीरज on November 1, 2013 at 7:37pm

अच्छा प्रयास है! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by राजेश 'मृदु' on October 31, 2013 at 2:44pm

जय हो आपकी, बहुत ही सुंदर प्रस्‍तुति, दाद कबूलें इस रचना पर, सादर

Comment by ram shiromani pathak on October 30, 2013 at 8:26pm

आदरणीया सरिता जी बहुत अच्छी  ग़ज़ल है बहुत बहुत   बधाई आपको //// सादर 

Comment by annapurna bajpai on October 30, 2013 at 6:24pm

सुंदर भावों से युक्त है आपकी गजल रचना आपको बहुत बधाई आ0 सरिता जी । 

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