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सवैया(मत्तगयन्द )

चाल बड़ी मनमोहक लागत, खेलत खात फिरै इतरावै !

लाल कपोल लगे उसके अरु ,होंठ कली जइसे मुसकावै !!

भाग रहा नवनीत लिये जब, मात पुकारत पास बुलावै !

नेह भरे अपने कर से फिर ,लाल दुलारत जात खिलावै !!

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राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Views: 856

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 10, 2013 at 9:06pm

आदरणीय राम शिरोमणी भाई , मज़ा  आ गया , आदरणीय बहुत बढ़िया छंद रचना की है ,!!!! आपको बधाई !!!!

Comment by annapurna bajpai on November 10, 2013 at 8:53pm

वाह !!! आ0 राम शिरोमणि जी बहुत सुंदर मत्त्गयंद छंद के लिए बधाई । 

Comment by ram shiromani pathak on November 10, 2013 at 7:52pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय अखिलेश   जी …सादर 

Comment by ram shiromani pathak on November 10, 2013 at 7:50pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय गोपाल नारायण  जी …सादर 

Comment by ram shiromani pathak on November 10, 2013 at 7:49pm

बहुत बहुत आभार भाई सिज्जू जी …सादर 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on November 10, 2013 at 7:22pm

बाल लीला का सुंदर वर्णन , बधाई ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 10, 2013 at 6:20pm

सात  भगण  दो गुरु  कुल ३२ मात्राएँ  I कमाल  है  शिरोमणि जी  I  सच ही है  तेजस्विनानाम हि  न वय : समीक्ष्यते I  छोटे छोटे शब्द और  सुन्दर विन्यास  I   मस्त मालतीगयंद की  चाल  I  आशिर्वादम   I


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 10, 2013 at 5:23pm

बहुत बढ़िया भाई राम शिरोमणि जी बधाई आपको

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