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!!! मनमोहन रूप सॅंवार रहे !!!

!!! मनमोहन रूप सॅंवार रहे !!!
दुर्मिल सवैया- आठ सगण

मनमोहन  रूप  सॅंवार  रहे, छवि  देख रहे  जमुना जल में।
सब ग्वाल कमाल धमाल करें, झट कूद पड़े जमुना जल में।।
अधरों पर  ज्ञान भरी  मुरली, रस धार  बहे जमुना जल में।
गउ-ग्वालिन डूब गयीं रस में, तन  तैर रहे जमुना जल में।।

के0पी0सत्यम/ मौलिक व अप्रकाशित

 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 17, 2013 at 2:06pm

केवल भाईजी, यही तो मेरा कहना है कि ऐसे में जबकि आपका प्रयास रंग नहीं ला पाया था, आपने आधी-अधूरी रचना को पटल पर क्यों रखा ?  कुछ और मेहनत किये होते. यही तो मेरा कहना है. 

वैसे आंचलिकता की महक से भरा शब्द ’बहे’ कोई ग़लत नहीं था.

शुभ-शुभ

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 17, 2013 at 1:09pm

आ0 सौरभ सर जी,  वाह क्या बात है!  आपने बिलकुल सही कहा.......यह दोनों बात ही मेरे संज्ञान में  थी। 'सॅंवार' और 'बही'.........'बही' के स्थान पर चार शब्द मेरे पास थे 1-ठगे....2-बहे.....3-जगे... और 4-बसे......।      स्वर में  'बही'  शब्द उपयोगी लगा....और आगे बढ़ गया।  आपके दायित्व निर्वहन के लिए आपको शत-शत नमन!      इन्ही विशेषताओ से ही ओ0बी0ओ0 की सार्थकता और उत्कृष्टता बनी हुई है।  आपके स्नेह, मार्गदर्शन और उत्साहवर्धन हेतु आपका बहुत-बहुत हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 17, 2013 at 12:42pm

आ0  सत्य नारायण भाई जी,  आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 17, 2013 at 12:41pm

आ0 विजय  भाई जी,  आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 17, 2013 at 12:38pm

आ0  नैथानी भाई जी,  आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 17, 2013 at 12:38pm

आ0 शिज्जू  भाई जी,  आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by Satyanarayan Singh on November 16, 2013 at 5:24pm

मन  को मुग्ध करती इस प्रस्तुति हेतु आपको हार्दिक बधाई. आदरनीय

Comment by विजय मिश्र on November 16, 2013 at 4:35pm
बहुत सुंदर केवलजी .आभार

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 16, 2013 at 11:47am

दुर्मिल सवैया पर उचित प्रयास हुआ है, भाई केवल प्रसादजी.

वैसे, मंच के प्रारूप के अनुरूप अपनी समझ को साझा करना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ.

आदरणीय गोपाल नारायण जी के कहे से मैं शत्-प्रतिशत् सहमत हूँ कि संवार के सं को गुरु की तरह लिया जाता है. लेकिन सही शब्द संवार है ही नहीं बल्कि वह सँवार है.

आप अन्यान्य स्थानों या कतिपय पत्रिकाओं में फिलहाल प्रचलित हुई अक्षरियों के प्रति अन्यथा भावुक न बनें जहाँ चन्द्रविन्दु के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग किया जाने लगा है. ऐसी जगहों पर हूँ को भी हूं लिखा जाने लगा है.

ऐसी कोई चलन हर तरह से नकारी जानी चाहिये.

दूसरे, शिल्प के लिहाज से सवैया के तीसरे पद का तुकान्त सही नहीं है.

यह आपको तभी समझ में आ गया होगा, जब आप रचना कर्म कर रहे थे. लेकिन अन्य कोई उपाय बनता न देख आपने चलता है कह कर इस पद को अपना लिया होगा.
भाईजी, यही चलता है  वाला तर्क आपकी रचनाओं को वह स्तर प्राप्त करने नहीं देता जिसके प्रति आप अत्यंत आग्रही दीखते हैं.

आपका रचनाकर्म वस्तुतः प्रयास है और प्रयास के कर्म में, भाईजी, अपने प्रति निरंकुश क्यों नहीं बनते आप ?

इस प्रस्तुति पर जिन पाठकों की सहमति आयी है उनमें से अधिकांश रचनाकर्म के धुरंधर हैं, लेकिन आपसे उन्होंने सुझाव का आदान-प्रदान नहीं किया है. यह आपके लिए भी सचेत हो जाने का इशारा है, भाईजी. 

बहरहाल, रचनाकर्म के लिए बधाई और शुभकामनाएँ
शुभ-शुभ
 

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on November 16, 2013 at 11:31am

बहुत सुन्दर सवैया भाईजी |

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