For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

!!! मनमोहन रूप सॅंवार रहे !!!

!!! मनमोहन रूप सॅंवार रहे !!!
दुर्मिल सवैया- आठ सगण

मनमोहन  रूप  सॅंवार  रहे, छवि  देख रहे  जमुना जल में।
सब ग्वाल कमाल धमाल करें, झट कूद पड़े जमुना जल में।।
अधरों पर  ज्ञान भरी  मुरली, रस धार  बहे जमुना जल में।
गउ-ग्वालिन डूब गयीं रस में, तन  तैर रहे जमुना जल में।।

के0पी0सत्यम/ मौलिक व अप्रकाशित

 

Views: 773

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 17, 2013 at 2:06pm

केवल भाईजी, यही तो मेरा कहना है कि ऐसे में जबकि आपका प्रयास रंग नहीं ला पाया था, आपने आधी-अधूरी रचना को पटल पर क्यों रखा ?  कुछ और मेहनत किये होते. यही तो मेरा कहना है. 

वैसे आंचलिकता की महक से भरा शब्द ’बहे’ कोई ग़लत नहीं था.

शुभ-शुभ

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 17, 2013 at 1:09pm

आ0 सौरभ सर जी,  वाह क्या बात है!  आपने बिलकुल सही कहा.......यह दोनों बात ही मेरे संज्ञान में  थी। 'सॅंवार' और 'बही'.........'बही' के स्थान पर चार शब्द मेरे पास थे 1-ठगे....2-बहे.....3-जगे... और 4-बसे......।      स्वर में  'बही'  शब्द उपयोगी लगा....और आगे बढ़ गया।  आपके दायित्व निर्वहन के लिए आपको शत-शत नमन!      इन्ही विशेषताओ से ही ओ0बी0ओ0 की सार्थकता और उत्कृष्टता बनी हुई है।  आपके स्नेह, मार्गदर्शन और उत्साहवर्धन हेतु आपका बहुत-बहुत हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 17, 2013 at 12:42pm

आ0  सत्य नारायण भाई जी,  आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 17, 2013 at 12:41pm

आ0 विजय  भाई जी,  आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 17, 2013 at 12:38pm

आ0  नैथानी भाई जी,  आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 17, 2013 at 12:38pm

आ0 शिज्जू  भाई जी,  आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by Satyanarayan Singh on November 16, 2013 at 5:24pm

मन  को मुग्ध करती इस प्रस्तुति हेतु आपको हार्दिक बधाई. आदरनीय

Comment by विजय मिश्र on November 16, 2013 at 4:35pm
बहुत सुंदर केवलजी .आभार

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 16, 2013 at 11:47am

दुर्मिल सवैया पर उचित प्रयास हुआ है, भाई केवल प्रसादजी.

वैसे, मंच के प्रारूप के अनुरूप अपनी समझ को साझा करना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ.

आदरणीय गोपाल नारायण जी के कहे से मैं शत्-प्रतिशत् सहमत हूँ कि संवार के सं को गुरु की तरह लिया जाता है. लेकिन सही शब्द संवार है ही नहीं बल्कि वह सँवार है.

आप अन्यान्य स्थानों या कतिपय पत्रिकाओं में फिलहाल प्रचलित हुई अक्षरियों के प्रति अन्यथा भावुक न बनें जहाँ चन्द्रविन्दु के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग किया जाने लगा है. ऐसी जगहों पर हूँ को भी हूं लिखा जाने लगा है.

ऐसी कोई चलन हर तरह से नकारी जानी चाहिये.

दूसरे, शिल्प के लिहाज से सवैया के तीसरे पद का तुकान्त सही नहीं है.

यह आपको तभी समझ में आ गया होगा, जब आप रचना कर्म कर रहे थे. लेकिन अन्य कोई उपाय बनता न देख आपने चलता है कह कर इस पद को अपना लिया होगा.
भाईजी, यही चलता है  वाला तर्क आपकी रचनाओं को वह स्तर प्राप्त करने नहीं देता जिसके प्रति आप अत्यंत आग्रही दीखते हैं.

आपका रचनाकर्म वस्तुतः प्रयास है और प्रयास के कर्म में, भाईजी, अपने प्रति निरंकुश क्यों नहीं बनते आप ?

इस प्रस्तुति पर जिन पाठकों की सहमति आयी है उनमें से अधिकांश रचनाकर्म के धुरंधर हैं, लेकिन आपसे उन्होंने सुझाव का आदान-प्रदान नहीं किया है. यह आपके लिए भी सचेत हो जाने का इशारा है, भाईजी. 

बहरहाल, रचनाकर्म के लिए बधाई और शुभकामनाएँ
शुभ-शुभ
 

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on November 16, 2013 at 11:31am

बहुत सुन्दर सवैया भाईजी |

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
1 hour ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
1 hour ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
4 hours ago
Sushil Sarna posted blog posts
19 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
20 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
yesterday
Jaihind Raipuri posted a blog post

ग़ज़ल

2122    1212    22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत मेंक्या से क्या हो गए महब्बत में मैं ख़यालों में आ गया उस…See More
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Admin's group आंचलिक साहित्य
"कुंडलिया छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ी ह भाखा, सरल ऐकर बिधान सहजता से बोल सके, लइका अऊ सियान लइका अऊ…"
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक…See More
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहै हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Monday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर…See More
Sunday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service