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तुम मेरे आधार (दोहे) -लक्ष्मण लडीवाला

जन्मदिन पर सबसे विगत में हुई भूलों के लिए क्षमा मांगते हुए "दोहे पुष्प" समर्पित है

अडसठ बसंत में मुझे,मिला सभी का प्यार,

गुरुवर अरु माँ-बाप का, वरदहस्त आधार |

 

सद्गुरु को मै दे सकूँ, ऐसी क्या सौगात, 

चरण पखारूँ अश्क से,इतनी ही औकात |

 

समर्पण निःशेष रहे, तुम मेरे आधार,

तुमसे तुमको मांग लू,करे अगर स्वीकार | 

 

जन्म दिवस पर दे रही,माँ मुझको आशीष 

सद्कर्मी पथ पर चलूँ, भला करे जगदीश | 

 

घर पर सब मिलजुल रहे, एक दूजे के संग 

घर पर यूँ खिलते रहे, प्रेम प्रीत के रंग |

 

मर्यादित जीवन रहे,रहे न चिंता युक्त 

अपना ये जीवन रहे, बुरे काम से मुक्त |

 

पत्नी मेरी जिन्दगी, बच्चे मेरा प्यार,

जुड़े रहे हर हाल में, इनसे मेरे तार |

 

सुधीजनों से मिल रहा, मुझको सचमुच प्यार

मुक्त ह्रदय से मानता,मै सबका आभार  |

 

प्रभु भक्ति में लीन रहूँ, मन पर रहे न  बोझ,

बनी रहे ओकात ये, करू  प्राथना  रोज  | 

(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 23, 2013 at 6:22pm

रचना पसंद करने एवं शुभ कामनाए व्यक्त करने हेतु आपका ह्रदय से आभार भाई श्री श्याम नारायण वर्मा जी 

Comment by Shyam Narain Verma on November 23, 2013 at 1:29pm

इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ......

न्मदिन की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएं । भगवान से प्रार्थना है कि वह आपको उतम स्वास्थ्य, दीर्घ आयु तथा सुख समृद्धि प्रदान करें....
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 23, 2013 at 9:53am

आपका हार्दिक आभार श्री अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 23, 2013 at 9:46am

हार्दिक आभार आपका श्री अखलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on November 23, 2013 at 12:31am

जन्म् दिन और दोहे दोनों की बधाई लक्ष्मण भाई॥

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 22, 2013 at 5:40pm

आपकी शुभ कामनाए निश्चित ही मेरे जीवन में सार्थक करेगी | आपका तहेदिल से हार्दिक आभार प्रधान संपादक,
श्री योगराज प्रभाकर जी | शुब शुभ


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 22, 2013 at 10:37am

जन्मदिन की बधाइयों ढेरों शुभकामनायें स्वीकार करें

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 22, 2013 at 9:49am

साहित्य पुरोधा और साहित्य प्रेमी ही ऐसे अवसर पर दुखी हो,सुझाव दे सकता है | छंद के शिल्प से समझौता मेरे अल्प ज्ञान को

ही दर्शाता है | आपका ध्यान आकर्षित करना उचित है, आदरणीय | सादर 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 22, 2013 at 9:32am

आप सभी के स्नेह के लिए हार्दिक आभारी हूँ आदरणीय श्री विजय निलोरे जी, श्री अरुण शर्मा "अनंत" जी,श्री गिरिराज भंडारी जी,

और विजय मिश्र जी | सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 22, 2013 at 12:34am

जन्मदिन की  बधाइयों के बाद एक निवेदन है आदरणीय, कि छंद के शिल्प से समझौता न करें जो कि आपसे अक्सर हो जाता है.

अडसठ बसंत गुजारे, पाकर सबका प्यार  जैसी पंक्तियाँ दुःखी कर देती हैं. तब तो और कि यह प्रस्तुति आपने अपने जन्मदिवस के उपलक्ष्य में साझा की है.

सादर

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