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ज़रा बरसात हो जाती हिमालय भी निखर जाता---(ग़ज़ल राज)

१२२२    १२२२    १२२२   १२२२ (बह्र--हजज मुसम्मन सालिम)

ज़रा बरसात हो जाती हिमालय  भी निखर जाता

 बदन फिर से दमक जाता ज़रा पैकर निथर जाता

 

परिंदा लौट के आता शज़र के सूखते आँसू

जरा सा साथ तुम देते ज़रा वो भी ठहर जाता

 

बड़ी उम्मीद थी उसको यहाँ कुछ कर दिखाने की

अगर तुम होंसला देते उफ़ुक उसका सँवर जाता

 

खड़ा चौखट पे रहता था सदा तेरी हिफ़ाजत को

कसम से आसरा देते नसीब उसका सुधर जाता

 

भला हो ऐ ख़ुदा तेरा जो तूने राह दिखलाई

भटक कर जिंदगी में आज वो जाने किधर जाता

 

निगाहें उन चरागों की ख़ुदा हम पे भी पड़ जाती

हथेली पर जला लेते सहर अपना उभर जाता

 

सिसकती कश्तियाँ जो दर्द ये उसको सुना देती

समंदर आज खुद अपने बढ़े कद से उतर जाता 

 

*बड़ा अच्छा किया जो झील में  फेंका नहीं  कंकड़

खफ़ा होता बहुत चन्दा फ़ुसूँ उसका बिखर जाता 

************************

*संशोधित

उफ़ुक=क्षितिज़

पैकर=मुखड़ा

सहर =जादू

फ़ुसूँ=जादू मन्त्र मुग्ध

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by rajesh kumari on November 28, 2013 at 9:33pm

प्रिय संदीप ग़ज़ल आपकी उपस्थति और सराहना से सार्थक हुई ,तहे दिल से आभारी हूँ. 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on November 28, 2013 at 8:28pm

क्या बात है आदरणीया इक इक अशआर चमक रहा है इस बेहतरीन नायब ग़ज़ल के लिए दिली दाद क़ुबूल करें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 28, 2013 at 12:40pm

सादर आभार आदरणीय एडमिन जी 

Comment by Saarthi Baidyanath on November 28, 2013 at 11:56am

आदरणीया ...बहुत बढ़िया , अच्छे अशआर से सजी ग़ज़ल पढ़ने को मिली !.....संशोधन के पश्चात् संग्रहणीय ग़ज़ल होगी ! बहुत बधाई

बड़ा अच्छा किया जो झील में फेंका नहीं  कंकड़ 

खफ़ा होता बहुत चन्दा फ़ुसूँ उसका बिखर जाता ...:)

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 28, 2013 at 11:28am

आदरणीय एडमिन जी कृपया ग़ज़ल के अंतिम शेर के उला में ये सशोधन कर दीजिये ---बड़ा अच्छा किया जो झील में  फेंका नहीं  कंकड़


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 28, 2013 at 11:24am

चन्द्र शेखर पाण्डेय जी तहे दिल से आभार आपका 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 28, 2013 at 11:23am

आदरणीया अन्नपूर्णा जी ग़जल पर आपकी सराहना मिली मेरा लिखना सार्थक हुआ दिल से आभारी हूँ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 28, 2013 at 11:22am

आदरणीय अखिलेश कृष्ण जी ग़ज़ल पर उत्साह वर्धन करती प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार आपका सादर 

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on November 27, 2013 at 11:45pm
अतीव सुन्दर गजल
नमन
Comment by annapurna bajpai on November 27, 2013 at 11:04pm

आ0 राजेश कुमारी जी बहुत ही सुंदर गजल हेतु बहुत बधाई । हर शेर लाजवाब बन पड़ा है । 

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