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ज़रा बरसात हो जाती हिमालय भी निखर जाता---(ग़ज़ल राज)

१२२२    १२२२    १२२२   १२२२ (बह्र--हजज मुसम्मन सालिम)

ज़रा बरसात हो जाती हिमालय  भी निखर जाता

 बदन फिर से दमक जाता ज़रा पैकर निथर जाता

 

परिंदा लौट के आता शज़र के सूखते आँसू

जरा सा साथ तुम देते ज़रा वो भी ठहर जाता

 

बड़ी उम्मीद थी उसको यहाँ कुछ कर दिखाने की

अगर तुम होंसला देते उफ़ुक उसका सँवर जाता

 

खड़ा चौखट पे रहता था सदा तेरी हिफ़ाजत को

कसम से आसरा देते नसीब उसका सुधर जाता

 

भला हो ऐ ख़ुदा तेरा जो तूने राह दिखलाई

भटक कर जिंदगी में आज वो जाने किधर जाता

 

निगाहें उन चरागों की ख़ुदा हम पे भी पड़ जाती

हथेली पर जला लेते सहर अपना उभर जाता

 

सिसकती कश्तियाँ जो दर्द ये उसको सुना देती

समंदर आज खुद अपने बढ़े कद से उतर जाता 

 

*बड़ा अच्छा किया जो झील में  फेंका नहीं  कंकड़

खफ़ा होता बहुत चन्दा फ़ुसूँ उसका बिखर जाता 

************************

*संशोधित

उफ़ुक=क्षितिज़

पैकर=मुखड़ा

सहर =जादू

फ़ुसूँ=जादू मन्त्र मुग्ध

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on November 27, 2013 at 9:59pm

आदरणीया राजेशकुमारीजी, सुंदर गज़ल हुई, हार्दिक बधाई,  अंतिम शेर केलिए विशेष।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 27, 2013 at 8:24pm

प्रिय  प्राची जी तहे दिल से आभार आपको ग़ज़ल पसंद आई ----अच्छा हुआ कंकड़ की संज्ञा बता दी वरना अशआर का फ़ुसूँ बिगड़ जाता ,सच में दैनिक बोलचाल में हम कंकड़ मारी बोल देते हैं जिसके भ्रम में ये गलती हुई ,बहुत- बहुत शुक्रिया इस और ध्यान दिलाने का,अगर हो सके तो  कंकड़ नहीं फेंका कर दीजिये प्लीज.  


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 27, 2013 at 5:08pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है आ० राजेश जी 

बहुत बहुत बधाई 

अंतिम शेर में 

बड़ा अच्छा किया जो झील में कंकड़ नहीं फेंकी.............कंकड़ तो पुल्लिंग संज्ञा है न ?


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 26, 2013 at 8:57pm

आदरणीय विजय निकोरे जी इस उत्साह वर्धन के लिए तहे दिल से आभार आपका. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 26, 2013 at 8:56pm

आदरणीय विजय मिश्र जी ग़ज़ल पर आपकी प्रतिक्रिया से अभिभूत हूँ ग़ज़ल आपके दिल तक पंहुची मेरा लिखना सार्थक हुआ तहे दिल से आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 26, 2013 at 8:55pm

आदरणीय डॉ आशुतोष जी आपकी प्रतिक्रिया से मेरी कलम को कितनी ऊर्जा मिली कह नहीं सकती ,ग़ज़ल आपको प्रभावित कर सकी मेरा लिखना सार्थक हुआ दिल से आभारी हूँ. 

Comment by vijay nikore on November 26, 2013 at 7:13pm

इस खूबसूरत गज़ल के लिए बधाई, आदरणीया राज जी।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by विजय मिश्र on November 26, 2013 at 6:03pm
लाजवाब ! क्या कमाल की शायरी लिक्खी है |हजारों दाद कमतर पड़ें इन अल्फाजों की बंदिस के लिए |ईश्वर ऐसे भाव ज्वारों को पकड़ने की प्रखरता दिनानुदिन प्रबल करें |साधुवाद राजेशजी |
Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 26, 2013 at 2:39pm

आदरणीया राजेश जी ...बार बार पढने की उत्सुकता जगाने वाली एक कामयाब ग़ज़ल ...भावों की उठती गिरती लहरों में लहराने उतराने का खूब लुत्फ़ उठाया ..किसी एक शेर को बिशेष कहने की स्थिति में नहीं हूँ ..पूरी ग़ज़ल हे शानदार है ..तहे दिल ढेरों बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 26, 2013 at 9:29am

जितेन्द्र गीत जी बहुत-बहुत शुक्रिया तहे दिल से आभार ग़ज़ल आपको पसंद आई. 

कृपया ध्यान दे...

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