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"क्या? आपने धूम्रपान छोड़ दिया? ये तो आपने कमाल ही कर दिया।"
"आखिर इतनी पुरानी आदत को एकदम से छोड़ देना कोई मामूली बात तो नहीं।"
"सही कहा आपने, ये तो कभी सिगरेट बुझने ही नही देते थे।"
"जो भी है, इनकी दृढ इच्छा शक्ति की दाद देनी होगी।"
"इस आदत को छुड़वाने का श्रेय आखिर किस को जाता है?"
"भाभी को?"  
"गुरु जी को?"
"नहीं, मेरी रिटायरमेंट को।"उसने ठंडी सांस लेते हुए उत्तर दिया।
.
.
(मौलिक व अप्रकाशित) 

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Comment by बृजेश नीरज on December 2, 2013 at 7:55pm

आदरणीय क्या कहूँ! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Akhand Gahmari on December 2, 2013 at 7:27pm

कटु सत्‍य, रिटायरमेंट के बाद बदल जाती है जीवन की दिशा और दशा दोनो, इस छोटी सी कहानी ने बहुत कुछ चलचित्र की भाँति मानस पटल पर ला दिया, आदरणीय

Comment by Sarita Bhatia on December 2, 2013 at 5:24pm

सही कहा योगराज सर आजकल बुढ़ापा अपने दम पर काटना है तो श्रेय  रिटायरमेंट को देना ही होगा 

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