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मैं तारों से बातें करता हूँ

 

जब गहन तिमिर के अवगुंठन में
धरती यह मुँह छिपाती है
मैं तारों से बातें करता हूँ
झिल्ली जब गुनगुनाती है.
(2)
फुटपाथों पर भूखे नंगे
कैसे निश्चिंत हैं सोये हुए
उर उदर की ज्वाला में
जाने क्या सपने बोये हुए.
(3)
दो बूंद दूध का प्यासा शिशु
माँ की आंचल में रोता है
रोते रोते बेहाल अबोध
फिर जाने कैसे सो जाता है!
(4)
क्या उसके भी सपनों में
कोई, सपने लेकर आता है
क्या उसके जीवन का सरगम
यह विश्व चराचर गाता है?
(5)
मेरे सपने तो टूट गये
कुछ बिखर गये अंधेरे में
कुछ तारे बनकर लटक गये
दूर गगन के डेरे में.
(6)
जो बिखर गये वो बिखर गये
मैं अब उन्हें नहीं चुनता
चंद किरणों के धागों से मैं
नये सपनों का जामा बुनता.
(7)
भूखा शिशु सो सकता है
होठों पर मुस्कान लिये
धरती का अवगुंठन हटता
प्राची का वरदान लिये.
(8)
अब मैं नहीं होता निराश
प्रकृति जब गीत सुनाती है
मैं तारों से बातें करता हूँ
झिल्ली जब गुनगुनाती है.
(मौलिक तथा अप्रकाशित)

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Comment by विजय मिश्र on December 3, 2013 at 3:12pm
"मेरे सपने तो टूट गये
कुछ बिखर गये अंधेरे में
कुछ तारे बनकर लटक गये
दूर गगन के डेरे में." -- शरदिन्दुजी , ये पंक्तियाँ तो मन को स्पर्श कर गयीं , जो परदुखकातर होता है ,उसके अपने दुःख स्वाभाविक ही गौण हो जाते हैं |अच्छी बात बताने के लिए साधुवाद |
Comment by किशन कुमार "आजाद" on December 3, 2013 at 9:11am

 सुन्दर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on December 3, 2013 at 3:10am

आदरणीय भाई पाठक जी, हर्दिक आभार.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on December 3, 2013 at 3:08am

जब किसी ऐसे की कलम से 'वाह', 'अप्रतिम' आदि प्रशंसासूचक शब्द निकलते हैं जिसकी रचना पढ़ने के लिये उन्मुख रहता हूँ तो अपनी रचना की सार्थकता जैसे मेरे सामने बैठकर मुस्कुराती हुई नज़र आती है....मुझे प्रेरणा मिलती है....संतोष मिलता है....तृप्ति मिलती है. हार्दिक आभार बृजेश जी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on December 3, 2013 at 3:02am

आदरणीय अखिलेश जी, मेरी रचना को ध्यान से पढ़ने के लिये आभारी हूँ. जी, मैं मानता हूँ कि 'यह' से लय में अवरोध उत्पन्न हो रहा है...लेकिन "धरती मुँह को छिपाती है" से समस्या का हल नहीं हो रहा है. शायद बेहतर होगा यदि सिर्फ़ "धरती मुँह छिपाती है" लिखा जाये. आपके विचारों का सदा स्वागत है. सादर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on December 3, 2013 at 2:52am

आदरणीया मीना जी, आपका हार्दिक आभार.

Comment by ram shiromani pathak on December 2, 2013 at 11:22pm

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय...........  बहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by बृजेश नीरज on December 2, 2013 at 9:24pm

वाह! अप्रतिम! आपको हार्दिक बधाई!

आप लाजवाब हैं सर जी!

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on December 2, 2013 at 7:30pm

बहुत सुंदर शर्दिंदु भाई हार्दिक बधाई।।  धरती यह मुँह छिपाती है //  धरती  मुँह को छिपाती है // यह से लय में अवरोध ह।.... सादर 

Comment by Meena Pathak on December 2, 2013 at 6:43pm

बहुत सुन्दर रचना आदरणीय | सादर बधाई स्वीकारें 

कृपया ध्यान दे...

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