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अतुकांत कविता .... लड़ूँगी प्रभु से

सोच रही हूँ
लड़ूँगी प्रभु से
जब मिलूँगी पर वह भी
डर से
छुपा बैठा है , आता ही नहीं
बुलाने पर हमारे हमारी जिन्दगी को
तबाह किये बैठा है , जिस दिन भी
मिलेगा सुनाउँगी
उसे बहुत जानता हैं
वह भी शायद
इसी लिए मेरी जिन्दगी
की डोर को
ढील दिए
बैठा है ....
.
सविता मिश्रा
"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 865

Comment

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Comment by savitamishra on December 18, 2013 at 11:37pm

dhanyvaad saurabh bhaiya ....ji jarur 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 18, 2013 at 8:30pm

अभिव्यक्ति अच्छी हुई है लेकिन संप्रेषण पर ध्यान देना आवश्यक है.

शुभेच्छाएँ

Comment by savitamishra on December 7, 2013 at 11:33pm

बैद्यनाथ भैया आभार आपका बहुत बहुत आभार

Comment by savitamishra on December 7, 2013 at 11:33pm

गोपाल चाचाजी नमस्ते ...पूरी कविता दे दीजिये पढ़ लेगें ..यह तो ऐसे ही लिखे थे न मालूम था पसंद आयेगी इतनी ..आभार तहेदिल से आपका

Comment by savitamishra on December 7, 2013 at 11:30pm

नीरज भाई जबाब भी हैं अपने पास fb पर शायद पोस्ट किये हैं याद नहीं ....आप सही कह रहें हैं ..आभार आपका

Comment by savitamishra on December 7, 2013 at 11:29pm

सुशिल भैया आभार दिल से आपका

Comment by savitamishra on December 7, 2013 at 11:27pm

राम शिरोमणि भाई अभी तो लगता हैं हम चलना सीख रहे हैं आभार आपका

Comment by savitamishra on December 7, 2013 at 11:25pm

नीलम sis शुक्रिया आपकी बधाई के लिए

Comment by savitamishra on December 7, 2013 at 11:24pm

बहुत बहुत आभार मीणा पाठक SIS दिल से

Comment by Saarthi Baidyanath on December 7, 2013 at 11:14pm

आपकी ये रचना बहुत अच्छी लगी सविता जी ...! मन मस्तिष्क पर  असर डालती  हुई रचना ..बढ़िया :)

कृपया ध्यान दे...

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