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ग़ज़ल-चल दिया है छोड़, क्या जुल्म ये काफी नहीं

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चल दिया है छोड़, क्या जुल्म ये काफी नहीं

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अब हमारी याद भी क्यूँ तुम्हें आती नहीं

चल दिया है छोड़,क्या जुल्म ये काफी नहीं //१//

तू हमारे दिल बसा , इसमें है कैसी खता

हो गया हमसे जुदा याद क्यूँ जाती नहीं  //२//

वो हवायें वो फिजायें बुलाती हैं तुम्हें

आ तो जाओ फिर कोई बात यूँ भाती नहीं //३//

मुडके भी देखा नहीं तुम गये जाने कहाँ

होश मेरा ले लिया जान क्यूँ जाती नहीं  //४//

मन तुझे तो सौप कर तन भी अर्पित कर दिया

रूह भी अर्पण तुझे अब तो कुछ बाकी नहीं  //५//

जल रहा है दिल मेरा, रो रही अब आँख ये

सुन के ना आये कभीं ऐसा तू मांझी नहीं  //६//

साथ देते 'रवि' ये आँसू तेरे दिन रात अब

आ ही जाते आँख से अब कोई नाही नहीं  //७//

=================================

मौलिक और अप्रकाशित -अतेन्द्र कुमार सिंह'रवि'

=================================

नाही-कोई रोकने वाला,मना करने वाला 

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Comment

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Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on December 10, 2013 at 8:24pm

आदरणीय नीरज जी धन्यवाद आपको ...सादर

Comment by Neeraj Neer on December 10, 2013 at 9:49am

बहुत सुन्दर 

मन तुझे तो सौप कर तन भी अर्पित कर दिया

रूह भी अर्पण तुझे अब तो कुछ बाकी नहीं .. क्या खूब कहा है ..

Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on December 9, 2013 at 9:53pm

डॉ आशुतोष मिश्र जी और आदरणीय गिरिराज जी आप दोनों जन को सादर प्रणाम और बहुत बहुत धन्यवाद  सराहने के लिए ....हम इसके हक़दार है भी कि नहीं पता नहीं .....पर हमारा ग़ज़ल कहना सार्थक हुआ .....आप सब अपना स्नेह यूँ ही बनाये रखें ......आभार

Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on December 9, 2013 at 9:47pm

आदरणीया मीना पाठक जी आपको बहुत बहुत धन्यवाद...आपको हमारी ग़ज़ल पसंद आई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 9, 2013 at 5:10pm

आदरणीय अतेन्द्र भाई , बहुत सुन्दर गज़ल कही है भाई , आपको हार्दिक बधाई !!!!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 9, 2013 at 2:51pm

मन तुझे तो सौप कर तन भी अर्पित कर दिया

रूह भी अर्पण तुझे अब तो कुछ बाकी नहीं  //५...इस बहतरीन रचना का ये शेर मुझे बेहद भाया ..सादर 

Comment by Meena Pathak on December 9, 2013 at 1:52pm

बहुत सुन्दर गज़ल , बधाई आप को 

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