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है वही रास्‍ते 

पथरीले चौड़े

पतले पक्‍के

घट गये रास्‍ते

बढ़ गयी दूरियाँ

 है वही गिलास

शरबतों से भरे

शराब से खाली

नशा प्‍यार का

नशा नशा का

दरवाजों पे दरबार

मन की शांति

मन का तनाव

भूला प्‍यार

बचा टकरार

वही है  रिश्‍ते

निभाने की होड़

दिखावट की होड़

मदद चाहत

मदद डर

प्रेम है वहीं

मन का मिलन

तन का मिलन

समर्पित  हम

धन समर्पित

कल हम आज हम

वही कल आज वही

सूरज वही रौशनी वही 

चॉंद वही चॉंदनी वही

मगर ना वही

तुम्‍हारी सभ्‍यता

तुम्‍हारे संस्‍कृति

ना तुम्‍हारे संस्‍कार

तुम्‍हारी पहचान वही

आज

लोभ,अहंकार

आधुनिकता

निर्लज्‍जता

और आडंबर में

बदल गया संसार

बदल गया संसार

 

 

मौलिक एवं अप्रकाशित अखंड गहमरी की रचना

Views: 656

Comment

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Comment by Akhand Gahmari on December 12, 2013 at 3:01pm

आदरणीय अग्रज गिरिराज भंडारी जी उत्‍साहवर्धन हेतु आभार

Comment by Meena Pathak on December 12, 2013 at 2:55pm

बहुत सुन्दर रचना , बधाई आप को 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 12, 2013 at 2:38pm

आदरणीय अखण्ड भाई , बहुत खूबसूरत रचना की है !!!! हार्दिक बधाई !!!!

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