मन अशांत चेहरा शान्त
आँखे शुन्य में निहारती
चारो तरफ था शोर था
मेरी गोद में सोया
मेरा सुहाग था
जीवन का उजाला
बच्चों का पालक
मेरा साहस मेरा श्रृंगार था
आज बीमार था
यहाँ मौत से थी जंग
वहाँ हड़तालियों की
वार्ता सरकार के संग
रोके थे गाड़ीयों के पहिये
आवाज साथीयों साथ रहीये
आती थी हिचिकियाँ बार बार
मौत का मौन निमंन्त्रण
मैं लाचार,कैसे चले पहीये
मेरा बच्चा जो चुप था
पूछा अम्मा यह
कहाँ का न्याय है
अपने स्वार्थ के लिये
पहिये क्यों रोके हैं
मेरे पापा की तरह
और कितने इस तरह
मरने पर क्यों मजबूर है
तभी गोद में सोया मेरा
सुहाग लिया लम्बी साँस
सो गया चिरनिन्द्रा में
टूट गयी उसकी साँसे
सूनी हो गई किसी की गोद
सफेद हो गयी मेरी साड़ी
अनाथ हो गये बच्चे
टूट गये सब सपने
मगर अखंड
ना टूटी ये हड़ताल
ना बढ़े पहिये।
लुट गया हमारा संसार
आज नहीं तो कल
टूटेगी ये हड़ताल
चल पडे़गें
फिर गाड़ीयों के पहिये
मगर अखंड अब कभी ना
लौटेगा हड़ताल की भेट चढ़ा
मेरा सुहाग, मेरा श्रृंगार
मेरा श्रृंगार।
मौलिक व अप्रकाशित अखंड गहमरी की रचना
Comment
अखंड भाईजी.. आप अक्षरी या हिज्जे और व्याकरण सम्बन्धी अशुद्धियों की तरफ़ एकदम से संवेदनशील हो जाइये. कविता आदि इसके बाद स्वयं होती रहेगी. शुभेच्छाएँ.. .
प्रणाम आदरणीय गिरिराज भंडारी जी आपके मार्गदर्शन एवं उत्सावर्धन का सदैव आकांक्षी
आदरणीय अखंड भाई , दंगा , हड़ताल का दूसरा दुखद पक्ष बताने मे आपकी रचना सफल रही है , आपको बहुत बधाई ॥
"Dr Ashutosh Mishra जी का यें संदेश गलती से डिलिट हो गया जिस के लिये हम डाक्टर साहब एंव आप सब से क्षमा प्रार्थी है आदरणीय अखंड जी .. हड़ताल की बिभीशिका को दर्शाती इस सुंदर कृति पर मेरी तरफ से तहे दिल बधाई सादर "
प्रणाम आदरणीय Dr Ashutosh Mishra जी आपके मार्गदर्शन एवं उत्सावर्धन का सदैव आकांक्षी
प्रणाम आदरणीय डा गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी आपके मार्गदर्शन एवं उत्सावर्धन का सवैद आकांक्षी
अखंड जी /मित्र
हड़ताल के सामाजिक दुश्परिनामो को इंगित करती
इस कविता का उद्देश्य सार्थक है i
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