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मौसम के
सहारे वह
अरमान सजाता
जीवन का
दिन रात ना समझे वह तो
एहसास,ना वर्षा,ना ठंड का
कमर तोड़ मेहनत पर भी
ना मिलता उसे निवाला था।
खाद बीज महँगा अब तो
पानी भी ना देता संग था।
कर्ज में डूब कर भी वह
करता पूरे कर्म था।
तब जीवनदायक
अनाज का दाना
आता उसके घर था।
बड़े अरमान इसी दाने पर
हाथ पीले बेटी के 
बदले मेहर की वह
तन दिखाती साड़ी को
जीवन की है और जरूरत
महीनो तक मुँह का निवाला
कर्ज निवारण इसी दाने से
सब इसी खेती पर निर्भर
पर नसीब का मार उस पर
कार्तिक में बरसे बादल
बह गये जिन्‍दगी के अरमा
निराश जीवन से अपने
मिटा गया खुद केा वह
टूट गयी चुड़ी,
धुल गया सिंन्‍दूर
पत्‍नी बेवा भरी जवानी,
ऑंगन सूना बच्‍चे अनाथ
ऑंगन में थी उसकी लाश 
वह कोई गैर नहीं
अंजान नहीं
कर्तव्‍य कर्ज में कुचाला
अखंड भारत का
एक किसान था।
जय जवान जय किसान था
मौलिक एवं अप्रकाशित अखंड गहमरी

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 8, 2013 at 12:48am

बहुत खूब !  इस प्रस्तुति को अब संशोधित कर फिर से लिखिये ताकि प्रस्तुतीकरण पर समुचित अभ्यास हो सके, भाईजी. और, अबकी कोशिश में इस कविता को भाषण का पर्याय न बनने दीजियेगा.

हार्दिक शुभेच्छाएँ

Comment by Akhand Gahmari on December 3, 2013 at 4:05pm

आदरणीय सुजान जी, गिरिराज जी, पाठक जी , गीत जी,डा0 गोपाल नारायण श्रीवास्‍तव जी एवं आदरणीया वेदिका जी उत्‍साहवर्धन हेतु आप सब को मेरा प्रणाम, आशा है कि आप भविष्‍य में भी हमारे उपर अपना स्‍नेह प्रदान करते रहेगें।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 3, 2013 at 3:52pm

गहमरी जी

किसान की समस्या पूरे देश जकी समस्या है  i

आपने अपनी स्टाइल से इस समस्या को उठाया है i

इसके लिए आपको धन्यवाद i

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 3, 2013 at 11:26am

आपकी रचना मन को छू गई, सच! एक किसान की व्यथा को आपने बखूबी चित्रित किया है, बधाई स्वीकारें आदरणीय अखंड जी

Comment by वेदिका on December 3, 2013 at 12:37am

किसान कि व्यथा बहुत खूब कही आपने| जो हमारा अन्नदाता है, उसके लिए कई योजनाएँ भी चलायी जा रही हैं| लेकिन उचित चैनल न होने से वह लाभान्वित नही हो पाता|

रचना कि संवेदनशीलता हेतु हार्दिक बधाई!!   

Comment by ram shiromani pathak on December 2, 2013 at 11:54pm

सुन्दर रचना आदरणीय भाई  जी , //////बहुत बहुत बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 2, 2013 at 9:41pm

आदरण्र्र्य अखंड भाई , बहुत सही , कटु सत्य का वर्णन किया है आपने अपनी रचना में !!! किसानों की भलाई का केवल प्रपंच रचा जाता है , सच मे भला सरकार नही करती ये अकाट्य सच है !!!! रचना के लिये आपको बधाई !!!!

Comment by सूबे सिंह सुजान on December 2, 2013 at 9:23pm

बहुत सुन्दर .किसान पर कुदरत ही सब कुछ कर पाती है। सरकार नही कुछ सही कर पाती। सरकार कर्मचारियों के लिये,, और निखट्टूओं के लिये तो कर सकती है किसान के लिये नहीं करती।।

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