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बर्फ देखो 
पिघलने लगी 
 
साँस पानी की 
जैसे थमी थी 
पत्थरों की  तरह 
जो जमी थी   … 
 
स्थितियाँ अब 
बदलने लगी   … बर्फ देखो। 
 
वो जो उम्मीद-
-जैसे खिला है 
साथ सूरज का 
हमको मिला है 
 
दूरियां पास 
चलने लगी     …बर्फ देखो। 
 
मौसम ने 
बदली है करवट 
पायी है 
जीने की आहट 
 
फिर से सांसें 
मचलने लगी
बर्फ देखो 
पिघलने लगी 
.
--मौलिक /अप्रकाशित 
अविनाश बागडे

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Comment by AVINASH S BAGDE on December 20, 2013 at 7:23pm

आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी ह्रदय से आभार। 

Comment by AVINASH S BAGDE on December 20, 2013 at 7:21pm

savitamishra mam....आभार !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 20, 2013 at 2:46am

बर्फ़ पिघलेने लगी.. . वाह ! यह पंक्ति-प्रयोग ही सुखद है !!

सादर

Comment by savitamishra on December 19, 2013 at 11:35am

बहुत सुंदर

Comment by AVINASH S BAGDE on December 19, 2013 at 11:02am

मेरी भावनाओं ने आपको स्पर्श किया जितेन्द्र भाई ,आभार !

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 19, 2013 at 8:34am

बहुत सुंदर भाव, बधाई स्वीकारें आदरणीय अविनाश जी

Comment by AVINASH S BAGDE on December 18, 2013 at 11:21pm

आभार Dr.Prachi Singh mam

Comment by AVINASH S BAGDE on December 18, 2013 at 11:20pm

शुक्रिया Maheshwari Kaneri mam..

Comment by AVINASH S BAGDE on December 18, 2013 at 11:19pm

आभार  Shyam Narain Verma जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 18, 2013 at 4:38pm

आदरणीय अविनाश जी 

प्रस्तुति...न तो मात्रिकता का निर्वहन कर रही है, न ही किसी निश्चित वार्णिक क्रम में शब्द बंधे हैं, न ही तुकांतता को सही लिया गया है..

मुझे इस अभिव्यक्ति में भाव/पृष्ठभूमि/उद्देश्य भी बहुत स्पष्ट या फिर सशक्त नहीं लगे.. यह रचना सुगढ़ होने के लिए अभी कुछ और समय की मांग करती दिखती है.

फिलहाल इस प्रयास पर शुभकामनाएं स्वीकारें

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