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बर्फ देखो 
पिघलने लगी 
 
साँस पानी की 
जैसे थमी थी 
पत्थरों की  तरह 
जो जमी थी   … 
 
स्थितियाँ अब 
बदलने लगी   … बर्फ देखो। 
 
वो जो उम्मीद-
-जैसे खिला है 
साथ सूरज का 
हमको मिला है 
 
दूरियां पास 
चलने लगी     …बर्फ देखो। 
 
मौसम ने 
बदली है करवट 
पायी है 
जीने की आहट 
 
फिर से सांसें 
मचलने लगी
बर्फ देखो 
पिघलने लगी 
.
--मौलिक /अप्रकाशित 
अविनाश बागडे

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Comment by Maheshwari Kaneri on December 18, 2013 at 2:12pm

.बहुत सुंदर नवगीत...बहुत-बहुत बधाई

Comment by Shyam Narain Verma on December 18, 2013 at 12:00pm
बहुत-बहुत बधाई स्वीकार करें...
Comment by AVINASH S BAGDE on December 18, 2013 at 11:00am

आद.अन्नपूर्णा जी ,मेरे नव गीत को आपकी हौसला अफ़ज़ाई के अल्फाज़ नसीब हुए /तहे दिल से शुक्रिया 

Comment by AVINASH S BAGDE on December 18, 2013 at 10:58am

आदरणीय कुंती जी आपके मन को इस नव गीत ने स्पर्श किया /अभिभूत हूँ 

Comment by AVINASH S BAGDE on December 18, 2013 at 10:56am

असीम आभार तपन जी 

Comment by AVINASH S BAGDE on December 18, 2013 at 10:56am

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी ,आपका ऐसा स्नेह मेरी हर रचना को मिलताहै /इस नव गीत पर भी मिला /शुक्रिया बहुत छोटा शब्द है   .... 

Comment by AVINASH S BAGDE on December 18, 2013 at 10:54am

डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी आपका शब्द शब्द एक नई  ऊर्जा प्रदान कर रहा //धन्यवाद साहब 

Comment by AVINASH S BAGDE on December 18, 2013 at 10:52am

मीनाजी आप जैसी विदुषी मेरे नवगीत को स्वीकार करे /अहो भाग्य। 

Comment by AVINASH S BAGDE on December 18, 2013 at 10:51am

मेरे नवगीत के प्रयास को आपकी सराहना के पंख मिले ///आभार आदरणीय सुशिल जी 

Comment by annapurna bajpai on December 17, 2013 at 11:32pm

 बहुत सुंदर नवगीत के लिए बधाई आपको आ0 अविनाश जी । 

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