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लाड़ली चली.. (अन्नपूर्णा बाजपेई)

बाबा की दहलीज लांघ चली

वो पिया के गाँव चली

बचपन बीता माँ के आंचल

सुनहरे दिन पिता का आँगन

छूटे संगी सहेली बहना भैया

मिले दुलारी को अब सईंया

मीत चुनरिया ओढ़ चली  

बाबा की ................

माँ की सीख पिता की शिक्षा

दुलार भैया का भाभी की दीक्षा

सखियों का स्नेह लाड़ बहना का

वो रूठना मनाना खेल बचपन का

भूल सब मुंह मोड चली

वो पिया के ...............

परब त्योहार हमको  बुलाना

कभी तुम न मुझको भुलाना

साजन संग मै आऊँगी

खुशियाँ संग ले आऊँगी

वो लाड़ली चली

बाबा की ..................

 

अप्रकाशित एवं मौलिक         

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Comment

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Comment by annapurna bajpai on December 23, 2013 at 7:27pm

आपका हार्दिक आभार आ0 मीना जी । बेटी की विदाई का क्षण कुछ ऐसा ही होता है । 

Comment by Meena Pathak on December 23, 2013 at 7:09pm

आदरनीय आन्न्पूर्णा जी आँखे भीग गयीं , बेटी की बिदाई का दृष्य आँखों के सामने घूम गया आप की रचना पढ़ कर |  बधाई स्वीकारें 

कृपया ध्यान दे...

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