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अश्क का दरिया भी रुख पे आ गया

अब्रे गम जब दिल पे मेरे छा गया

अश्क का दरिया भी रुख पे आ गया

आइना देखा है जब भी दोस्तों

सामने मेरे मेरा सच  आ गया

यूं तो गुल लाखों थे बगिया में मगर

दिल को लेकिन कोई कांटा  भा गया

वो हसीं गुल आने वाला है इधर

चूम झोंका खुशबू का बतला गया

हाल उनसे कहते दिल का जब तलक

यार नजरों से ही सब जतला गया

जिसने भर दी खार से ये जिन्दगी

फूल नकली दे के फिर बहला गया

मौलिक व अप्रकाशित 

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 24, 2013 at 5:04pm

//आइना देखा है जब भी दोस्तों

सामने सच मेरा मेरे  आ गया//

सामने मेरे मेरा सच आ गया 

मिसरा सानी जरा ऐसे पढ़ कर देखें,शायद पसंद  आये .

//वो हसीं गुल आने वाला है इधर

चूम झोंका खुशबू का बतला गया//

किसको चूम ?

//यूं तो गुल लाखों थे बगिया में मगर

दिल को लेकिन कांटा कोई भा गया//

दिल को लेकिन कोई कांटा भा गया

अगर ऐसे कहे तो !

//हाल उनसे कहते दिल का जब तलक

यार नजरों से ही सब जतला गया//

वाह वाह, बहुत बढ़िया,क्या खुबसूरत शेर निकला है, बहुत अच्छे . बधाई इस प्रस्तुति पर। 

Comment by Abhinav Arun on December 24, 2013 at 3:15pm
जिसने भर दी खार से ये जिन्दगी
फूल नकली दे के फिर बहला गया
वाह क्या कहने , डॉ साहब खूबसूरत ग़ज़ल , हार्दिक बधाई !!
Comment by Shyam Narain Verma on December 24, 2013 at 1:02pm
बहुत खूब ,  आपको हार्दिक बधाइयाँ ....

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 24, 2013 at 12:16pm

शुक्रिया , भाई आशुतोष , सलाह को मान देने के लिये ॥

Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 24, 2013 at 10:29am

आदरणीय गिरिराज भाई साब //हौसला अफजाई के लिए शुक्रिया ..आपका सुझाव मुझे अच्छा लगा मैं ग़ज़ल एडिट कर रहा हूँ ..आपके सुझाव और प्रतिक्रिया के लिए पुनः धन्यवाद के साथ .सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 24, 2013 at 10:26am

आदरणीय शिज्जू जी .आप की और गिरिराज भाईसाब की नसीहत पर अमल करते हुए प्रयास कर रहा हूँ ..ऐसा ही स्नेह बनाए रखें ..सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 23, 2013 at 8:49pm

आदरणीय आशुतोष भाई , बहुत अच्छी गज़ल कही है । मतला बहुत पसन्द आया भाई ॥

अब्रे गम जब दिल पे मेरे छा गया

अश्क का दरिया भी रुख पे आ गया -------- वाह वा ॥ अनेकों बधाइयाँ ॥

दिल को पर चंपा ही कोई भा गया -- इस मिसरे के बदले --    दिल को लेकिन कांटा कोई भा गया  --- कैसा रहेगा ?


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 23, 2013 at 8:41pm

अच्छी ग़ज़ल है आदरणीय डॉ आशुतोष सर अब आपकी रचनायें रफ्ता रफ्ता निखर के आ रही है बधाई स्वीकार करें, 

कृपया ध्यान दे...

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