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गंगा चुप है ...................

वेगवती गंगा प्रचंड प्रबल  

लहराती, बल खाती जाए

रूप चाँदी सा दूधिया धवल

जनमानस  तारती  जाए

 वो गंगा !! आज चुप है ..............

हे ! मानस किञ्च्त जागो

भागीरथी की व्यथा सुनो

तुमको तो जीवन दिया है

किन्तु  तुमने क्या दिया है

व्यथित गंगा !! आज चुप है ................

आंचल मैला किए देते हो

मुख मे भी विष दिये देते हो

चाँदी सा रूप हुआ क्लांत

सौम्यता भी हुई म्लान्त

म्लान्त गंगा !! आज चुप है ................  

जननी जग की कहलाती हूँ

आते हो स्वागत करती हूँ

नित  पाँव पखारा करती  हूँ

फिर क्यों तुम्हें न सुहाती हूँ

जीवन दायिनी गंगा !! आज चुप है ..................

 

अप्रकाशित एवं मौलिक 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 10, 2014 at 11:45pm

इस कविता के माध्यम से गंगा की दशा को साझा करने के लिए आभार

सादर

Comment by annapurna bajpai on January 7, 2014 at 11:18pm

आ0 बैद्य नाथ जी , आ0 गिरिराज जी , आ0 कुंती दीदी , आ0 ब्रम्ह्चारी जी , आ0 निकोर जी आप सभी का हार्दिक आभार । 

Comment by vijay nikore on January 7, 2014 at 9:12am

अति मार्मिक प्रस्तुति। बधाई। जय श्री माँ गंगे !

Comment by S. C. Brahmachari on January 6, 2014 at 10:29pm
राम तेरी गंगा मैली हो गयी पापियों के पाप धोते धोते ---- पतित पावनी गंगा का क्या हाल कर रक्खा है इंसान ने , गंगा आचमन के लायक भी नहीं रह गयी । किससे करूँ शिकायत ? गंगा किनारे स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे अध्ययन के दौरान हमारे एक कवि मित्र ने लिखा था --- गंगा मैया के तट पर बस कर भी मै रह गया पिपासा, अपने प्यासे अधर दिखा कर सागर से यह बात कहूँगा ! बहन अन्नपूर्णा जी , माँ गंगा की व्यथा के मार्मिक चित्रण हेतु बधाई !
Comment by coontee mukerji on January 6, 2014 at 5:42pm

एक बहुत ही मार्मिक रचना. अंपूर्णा  जी हार्दिक बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 6, 2014 at 7:37am

आदरणीया अन्नपूरणा जी , माँ गंगा की आंतरिक व्यथा का सुन्दर चित्रण किया है आपने , आपको बहुत बधाइयाँ ॥

Comment by Saarthi Baidyanath on January 5, 2014 at 11:14pm

बहुत ही उत्तम रचना ...सार्थक अभिव्यक्ति ...जो हर भारतीय के ह्रदय की वेदना है ..

आंचल मैला किए देते हो

मुख मे भी विष दिये देते हो

चाँदी सा रूप हुआ क्लांत

सौम्यता भी हुई म्लान्त

म्लान्त गंगा !! आज चुप है......बहुत बहुत बधाइयाँ 

Comment by annapurna bajpai on January 5, 2014 at 8:34pm

आपका हार्दिक आभार आ0 अखिलेश जी । 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on January 5, 2014 at 8:29pm

पतित पाविनी की व्यथा सुनाई , आदरणीया अन्नपूर्णाजी हार्दिक बधाई॥

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