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ग़ज़ल - सच को अपनाने का जब ऐलान किया !

ग़ज़ल –
फैलुन फैलुन फैलुन फैलुन फैलुन फा
२२ २२ २२ २२ २२ २

सच को अपनाने का जब ऐलान किया ,
सबने मुझ पर बाणों का संधान किया |

जागो रण में नींदें भारी पड़ती हैं ,
अभिमन्यू ने प्राणों का बलिदान किया |

आंसू की दो बूँदें टपकी पन्नो पर ,
मैंने अपने किस्से का उन्वान किया |

सोने की अपनी अपनी लंकाएं गढ़ ,
हमने ख़ुद में रावण को मेहमान किया |

देश निकाला देकर सारे पेड़ों को ,
हमने अपने शहरों को वीरान किया |

भूख ग़रीबी महंगाई दो दिन के हैं ,
कुबड़े काने राजा ने फरमान किया |

दूषित होकर भी गंगा गंगा ही है ,
बेशक हमने अपना ही नुक्सान किया |

वृद्धाश्रम में नाम लिखाकर भूल गए ,
हमने अपनों का ऐसा सम्मान किया |

बाहर बाहर उन्नतशील लबादे हैं
भीतर भीतर मूल्यों को शमशान किया |

सच्चाई थी धोती लाठी ऐनक में ,
बापू ने उस सच्चाई का ध्यान किया |

* सर्वथा मौलिक और अप्रकाशित .

©& ® 06012014- अभिनव अरुण

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Comment by Abhinav Arun on January 15, 2014 at 3:26pm

सादर प्रणाम अग्रज श्री !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 14, 2014 at 3:46pm

हार्दिक शुभकामनाएँ और बधाइयाँ भाई अभिनव अरुण जी

Comment by Abhinav Arun on January 9, 2014 at 4:56pm

अर्दिक आभार आदरणीया सविता मिश्र जी बहुत शुक्रिया !

Comment by savitamishra on January 9, 2014 at 10:50am

देश निकाला देकर सारे पेड़ों को ,
हमने अपने शहरों को वीरान किया |....सुन्दर
सभी में एक से बढ़कर एक सच्चाई बयान की है आपने

Comment by Abhinav Arun on January 9, 2014 at 8:56am
आपकी प्रेरक टिप्पणी केलिए आभार और अभिवादन आदरणीया वंदना जी , शुक्रिया !
Comment by Abhinav Arun on January 9, 2014 at 8:55am
आदरणीय श्री दिलीप नैथानी जी दिली शुक्रिया आपका और नूतनवर्ष अभिनन्दन
Comment by Abhinav Arun on January 9, 2014 at 8:54am
आपका हार्दिक आभार अश'आर पसंद करने केलिए आदरणीय श्री सरथी जी .
Comment by vandana on January 9, 2014 at 6:00am

सच को अपनाने का जब ऐलान किया ,
सबने मुझ पर बाणों का संधान किया |

बहुत बढ़िया ग़ज़ल आदरणीय 

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on January 8, 2014 at 10:24pm

जागो रण में नींदें भारी पड़ती हैं ,
अभिमन्यू ने प्राणों का बलिदान किया |   वाह वाह !!

दूषित होकर भी गंगा गंगा ही है ,
बेशक हमने अपना ही नुक्सान किया |

वृद्धाश्रम में नाम लिखाकर भूल गए ,
हमने अपनों का ऐसा सम्मान किया |   बेहतरीन !

इस लाजवाब ग़ज़ल पर दिली दाद आदरणीय !

Comment by Saarthi Baidyanath on January 8, 2014 at 10:16pm

देश निकाला देकर सारे पेड़ों को ,
हमने अपने शहरों को वीरान किया |....नवीन लगा ये बिम्ब ...वाह 

बाहर बाहर उन्नतशील लबादे हैं
भीतर भीतर मूल्यों को शमशान किया |....बहुत बढ़िया अभिनव अरुण साहब ...वाह 

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