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क़द बढ़े लेकिन, वो बौरे हो गए.........

जब कभी भी भोर के मालिक अँधेरे हो गए
क़ाफ़िलें लुटते रहे , रहबर लुटेरे हो गए

कुछ हुयी इंसान में भी इस तरह तब्दीलियाँ
क़द बढ़े लेकिन , वो बौरे हो गए

हो गयी खुशबू ज़हर इस दौर में
बाग़ में , साँपों के डेरे हो गए

ग़र बँटी धरती कहाँ तेरा चमन रह जायेगा
भूल है तेरी अलग तेरे बसेरे हो गए

झूठ तो देखो इधर किस क़दर धनवान है
और उधर नीलाम सच के घर बसेरे हो गए

आदमी डरता था पहले , रात में ही "अजय"
सोचिये कितने भयानक अब सबेरे हो गए

अजय कुमार शर्मा
मौलिक और प्रकाशित

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Comment by ram shiromani pathak on January 14, 2014 at 9:25pm

सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय अजय भाई 

Comment by Ajay Agyat on January 9, 2014 at 9:17pm

ग़ज़ल भटक गयी ... बहर से 

Comment by savitamishra on January 9, 2014 at 10:51am

बहुत सुंदर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 9, 2014 at 8:26am

बहुत सुंदर भाव, बधाई,बह्र के बारे क्या कहूँ अभी मुझे ही बहुत कुछ सीखना है .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 8, 2014 at 9:36pm

आदरणीय अजय भाई , बहुत सुन्दर बातें कही हैं आपने , रचना के माध्यम से  ॥ आपको बहुत बधाई ॥ अगर आपने गज़ल कही है तो सभी शे र एक ही बह्र मे नही है , कृपया एक बार देख लें ॥

Comment by coontee mukerji on January 8, 2014 at 6:25pm

जब कभी भी भोर के मालिक अँधेरे हो गए
क़ाफ़िलें लुटते रहे , रहबर लुटेरे हो गए......बहुत खूब.

Comment by Shyam Narain Verma on January 8, 2014 at 11:46am
बहुत सुंदर भाव, बधाई

कृपया ध्यान दे...

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