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मेरा अपना गांव (रोला छंद)

मेरा अपना गांव, विश्‍व से न्यारा न्यारा ।
प्रेम मगन सब लोग, लगे हैं प्यारा प्यारा ।।
काका बाबा होय, गांव के बुजुर्ग सारे ।
हर सुख दुख में साथ, सखा बन काम सवारे ।।

अमराई के छांव, गांव के छोरा छोरी ।
खेले नाना खेल, करे सब जोरा जोरी ।।
ग्वाला छेड़े वेणु, धेनु धुन सुन रंभाती ।
मुख पर लेकर घास, उठा शिश स्नेह दिखाती ।।


मोहे पनघट नाद, सखी मिल करे ठिठोली ।
गारी देवे सास, करे बालम बरजोरी ।।
चारी चुगली खास, कथा सा सुने सुनावे ।
सभी शोर संदेश, यही से ही बगरावे ।।

गिल्ली डंडा खेल, गली में खेले बच्चे ।
झगड़े व करे मेल, सभी है मन के सच्चे ।।
बस्ता थाली हाथ, चले हैं खाने पढ़ने ।
सभी बाल गोपाल, धरे पग जीवन गढ़ने ।।

फसल पके हैं खेत, मोर सा किसान नाचे ।
राहत का ले सांस, कर्मफल अपना जांचे ।।
भरा भरा खलिहान, गांव में लक्ष्मी सोहे ।
खुशी से दमके देह, देव को मानव मोहे ।।
---------------------------
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by अरुन 'अनन्त' on January 20, 2014 at 1:43pm

आदरणीय रमेश भाई जी गाँव की कई कई बातों को आपने सुन्दरता से रोले में समाहित किया है, सभी रोले अच्छे बने हुए हैं थोड़ी बहुत प्रवाह और शिल्प सम्बन्धी कमियां हैं जो अभ्यास करते करते दूर हो जाएँगी. इस प्रयास पर बधाई स्वीकारें.

Comment by बृजेश नीरज on January 20, 2014 at 12:06am

अच्छा प्रयास है! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 19, 2014 at 9:45am

बहुत सुंदर भाव, बधाई आदरणीय रमेश जी

Comment by annapurna bajpai on January 17, 2014 at 10:19pm

सुंदर रोला छंद हेतु बधाई स्वीकारें 

Comment by रमेश कुमार चौहान on January 17, 2014 at 8:26pm

आदरणीय गिरिराजजी एवं आदरणीया मीनाजी आपके स्नेह के लिये सादर धन्यवाद

Comment by रमेश कुमार चौहान on January 17, 2014 at 8:24pm

आदरणीय सौरभजी, आपके द्वारा छंदोत्सव हेतु प्रदत्त जानकारी के आधार पर अम्यास करने का प्रयास किया है । कुछ कमजोरी रह गई इसे दूर करने का प्रयास सतत रहेगा । इसी प्रकार आप मेरा मागदर्शन करते रहिगा । सादर धन्यवाद

Comment by Meena Pathak on January 17, 2014 at 7:55pm

फसल पके हैं खेत, मोर सा किसान नाचे ।
राहत का ले सांस, कर्मफल अपना जांचे ।।
भरा भरा खलिहान, गांव में लक्ष्मी सोहे ।
खुशी से दमके देह, देव को मानव मोहे ।।............... बहुत सुन्दर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 17, 2014 at 12:33pm

आदरणीय रमेश भाई , रोला छंद की सुन्दर रचना हुई है , आपको बधाइयाँ ॥ आदरणीय सौरभ भाई की सलाह पर ज़रूर ध्यान दें ॥


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 17, 2014 at 12:28am

रमेश भाईजी, एक सार्थक और गंभीर कोशिश के लिए हार्दिक बधाई. एक दो पंक्तियाँ अभी आपसे समय चाहती थीं लेकिन आपने अच्छा अभ्यास किया है.

उदाहरण लें :  झगड़े व करे मेल, सभी है मन के सच्चे  को करते झगड़े-मेल, किन्तु सब मन के सच्चे क्यों न किया जाय ?

रचनाकर्म के क्रम में आपको स्वयं ही भान हुआ होगा कौन सी पंक्ति असहज हुई रह गयी है, एक बार उन्हें फिर से देख लें.

शुभेच्छाएँ.

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