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चारू चरण
चारण बनकर
श्रृंगार रस
छेड़ती पद चाप
नुुपूर बोल
वह लाजवंती है
संदेश देती
पैर की लाली
पथ चिन्ह गढ़ती
उन्मुक्त ध्वनि
कमरबंध बोले
लचके होले
होले सुघ्घड़ चाल
रति लजावे
चुड़ी कंगन हाथ,
हथेली लाली
मेहंदी मुखरित
स्वर्ण माणिक
ग्रीवा करे चुम्बन
धड़की छाती
झुमती बाला कान
उभरी लट
मांगमोती ललाट
भौहे मध्य टिकली
झपकती पलके
नथुली नाक
हंसी उभरे गाल
ओष्‍ठ गुलाबी
चंचल चितवन
गोरा बदन
श्‍वेत निर्मल मन
मेरे अंतस
छेड़ती है रागनी
प्राण सम सजनी ।।
------------------
मौलिक अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 5, 2014 at 11:18pm

ललित भावों को इस विधा के माध्यम से आपने बखूबी प्रस्तुत किया भाई रमेशजी

सरस और गेय प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारें.

बहुत सुन्दर !

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 3, 2014 at 7:44pm

आदरणीय भंडारीजी, नीरजजी आपके सराहना से संतोष हुआ सादर धन्यवाद

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 3, 2014 at 7:42pm

आदरणीया अन्पूर्णाजी, मीनाजी एवं कुंतीजी आपलोगों रचना को सराहा, रचनाकर्म सार्थक हुआ । आप सभी को सादर धन्यवाद

Comment by बृजेश नीरज on February 2, 2014 at 10:23pm

सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by coontee mukerji on February 2, 2014 at 3:38pm

बहुत सुंदर.बधाई आप को रमेश जी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 1, 2014 at 8:41pm

आदरणीय रमेश भाई , सुन्दर चोका के लिए आपको हार्दिक बधाई ॥

Comment by Meena Pathak on February 1, 2014 at 8:38pm

मन खुश हो गया पढ़ कर ... बहुत सुन्दर .. बधाई आप को 

Comment by annapurna bajpai on February 1, 2014 at 7:58pm

सुंदर , अति सुंदर चोका , बधाई आपको । 

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