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आत्म-धन - (विजय निकोर)

आत्म-धन

 

होगी ज़रूर कोई गहरी पहचान

दर्द की तुम्हारे इस दर्द से मेरे

कि जाने किन-किन तहों से उभरती

छटपटाती

लौट आती है वही एक याद तुम्हारी

यादों के कितने घने अँधियाले

पेड़ों के पीछे से झाँकती ...

मैंने तो कभी तुमको

इतना स्नेह नहीं दिया था

भीगी आँखों से, हाँ,

भीगी आँखों को देखा था

कई बार... खड़े-खड़े ...  चुपचाप

 

पंख कटे पक्षी-सा तड़पता

ठहर नहीं पाता है मन पल-भर कहीं

तुम्हारा .... न मेरा

सुलगती है ऐसे में आग नित्य अकस्मात

अर्थहीन असंतोष की

कुछ जल्दी मुरझा जाता है हर दिन हमारा

झुक आती है झट पहचानी साँझ संवलाई

और उभर-उभर आते हैं

कितने नए-नए सवालों के अनजाने कर्ज़ 

भीतरी अँधेरे भयानक वीरानों से

कई घने पुराने कितने

बड़े-बड़े  दर्द

 

... मेरे आत्म-धन

 

                 -------

                                        --- विजय निकोर

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

 

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Comment by गिरिराज भंडारी on January 21, 2014 at 3:46pm

आदरणीय बड़े भाई , अनकहे प्रेम की गहरी अनुभूतियों की झलक देती आपकी नहुत सुन्दर कवीता के लिये आपको बहुत बधाई ॥

Comment by Vindu Babu on January 21, 2014 at 1:33pm

आदरणीय:

अमूर्तता को जीने का साहस देती हुई आपकी भावपूर्ण रचना को कई बार पढ़ा।

पता नहीं रचना गहराई तक मैं पहुंच पाई कि नहीं लेकिन पढकर सुखद अनुभूति हुई।

मैंने तो कभी तुमको

इतना स्नेह नहीं दिया था

भीगी आँखों से, हाँ,

भीगी आँखों को देखा था

कई बार... खड़े-खड़े ...  चुपचाप....समर्पण का चित्रण कितना स्पर्शी है।

अंतिम पंक्तियाँ बड़ी मनमोहक लगीं,

...मेरे आत्म-धन तक पहुंचते ही आत्मसंतुष्टि मिली।

सादर

शुभ शुभ

Comment by Arun Sri on January 21, 2014 at 12:01pm

कविता का मौन जाने किस किस गहराइयों में जीता है प्रेम को , समर्पण को , पीड़ा को ! कमोबेस यही स्थिति आपकी हर कविता के साथ होती है ! बहुत ही मर्मस्पर्शी कविता !

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