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जीवन की क्षणमंगुरता

मैं

तन्हा, खामोश बैठी,

एक दिन

निहार रही थी

अपना ही प्रतिबिम्ब

खूबसूरत झील में,

कई पक्षी

क्रीड़ा कर रहे थे

नावों में बैठे

कई जोडे़

अठखेलियाँ करती

सर्द हवा को

गर्मी दे रहे थे

झील के किनारे खडे़

ऊँचे-ऊँचे दरख्त

भी हिल रहे थे,

गले मिल रहे थे

तभी एंक चील ने

अचानक तेजी से

गोता लगाया

किनारे आई मछली को

मुँह मे दबा

जीवन क्षणमंगुर है

यह एहसास कराया

आज जो प्रतिबिम्ब

दिखे थे पानी में

कल वो रहेंगे या नहीं,

यह समझाया ।

अगले दिन झील पर

अलग ही समां था

न सर्द हवा

न दरख्तों का हिलना

झील के ठहरे से

पानी में

कश्तियों का बहना

थोड़ा कोलाहल,

ठहरी कश्ती में बैठी मैं

निहार रही थी

झील के पानी में

गोता लगाते

सूरज के प्रतिबिम्ब को

शान्त नीरव सांझ की

उतरती पालकी को ।

कुनमुनाती धूप,

विदा हो रही थी

झील के चमकते पानी पर

रात अपना डेरा डाल रही थी

सूरज एक दिन

निगल चुका था ।

मोहिनी चोरडिया चेन्नई

 मौलिक एवं अप्रकाशित 

 

 

 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 5, 2014 at 11:29pm

सही शब्द क्षणभंगुर है. इससे क्षणभंगुरता न कि क्षणमंगुरता.

संप्रेषणीयता पर तनिक प्रयास बहुत कुछ सार्थक करता जायेगा, आदारणीया..

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 5, 2014 at 10:45am

जीवन की क्षणभंगुरता का वास्तविक एहसास जब हृदय करता है तो नज़रिया कैसे बदलने सा लगता है..इस बात को बहुत सुन्दरता से प्रस्तुत किया है आदरणीया मोहिनीचंद्रा जी..

सिर्फ कुछ एक जगह पन्क्चुएशन मार्क्स की और आवश्यकता है ताकि प्रस्तुति प्रवाह में निर्बाध स्पष्ट होती जाए.

सादर शुभकामनाएं 

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 3, 2014 at 8:33pm

बहुत ही सुंदर रचना, बधाई बधाई

Comment by mohinichordia on February 3, 2014 at 5:24pm

आप सबका आभार .

Comment by बृजेश नीरज on February 2, 2014 at 10:26pm

वाह! बहुत सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by coontee mukerji on February 2, 2014 at 3:31pm

बहुत सुंदर व दार्शनिक रचना है.....आपको बधाई.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 2, 2014 at 9:54am

वास्तविकता को बयां करती रचना पर , हार्दिक बधाई आदरणीया मोहिनी जी

Comment by Vindu Babu on February 2, 2014 at 4:15am

 जीवन की क्षण भंगुरता को छोटी-छोटी घटनाओं में अनुभव करवाती हुई अच्छी रचना बन पड़ी है आदरणीया।

आपको बहुत बधाई इस अभिव्यक्ति के लिए।

सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 1, 2014 at 8:47pm

आदरणीया , जीवन के एक सत्य की सुन्दर अभिव्यक्ति के लिये आपको हार्दिक से बधाइयाँ ॥

Comment by annapurna bajpai on February 1, 2014 at 8:18pm

आओ मोहिनी जी बहुत सुंदर रचना हेतु बधाई स्वीकारें । 

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