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लो .... 

ये क्या मौसम बदलते ही 

तुमने रिश्तों का स्वेटर 

खोल दिया ... 

एक एक फंदे 

जो तुमने चढ़ाये थे 

इतने जतन से 

अचानक ही 

उन्हे उतार दिया .... 

इतने जल्दी तुम 

भी बदल गए 

इस मौसम की तरह 

चलो .... 

ऐसा करना 

मेरी यादों की सलाईयों को 

सहेज कर रख लेना 

फिर कभी ठंड आएगी 

और उस सलाईयों 

पर अहसासों के ऊन से 

फिर रिश्तों का स्वेटर 

बना लेना ... 

किसी अपने के लिए

रिश्तों के लिए 

नातों के लिए.... 

मौलिक व अप्रकाशित 

Views: 536

Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 4, 2014 at 12:49am

भावुक कॉड छू रही रचना हुई है.

वैसे एक बात स्पष्ट हुई, आपको स्वेटर के बिने जाने का ढब मालूम है. अच्छा लगा.

शुभ-शुभ

Comment by shashi purwar on February 11, 2014 at 11:07pm

बहुत सुन्दर रचना है रिश्तो की गर्माहट में जब यह पल अवतरित होते है तो फंदे उधड़ते चले जाते है और उन फंडो को सहेजना भी हूनह का कार्य है , रचना में  रचनाकार ने बखूबी अपनी बात कही है , और प्राची जी से सहमत हूँ उस की  जगह उन सलाइयों होना चाहिए , एक बात मेरे जहन में भी अटक गयी कि। ……… रिश्तो को सहेजते सहेजते यह कहाँ से आ गया

बना लेना ... 

किसी अपने के लिए

रिश्तों के लिए 

नातों के लिए....          

……। जैसे यहाँ से नया पड़ाव शुरू हो गया :) वैसे रचना बहुत सुन्दर लगी हार्दिक बधाई आपको

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 11, 2014 at 9:52pm

मेरी यादों की सलाईयों को 

सहेज कर रख लेना 

फिर कभी ठंड आएगी 

और उस सलाईयों 

पर अहसासों के ऊन से 

फिर रिश्तों का स्वेटर 

बना लेना ... 

किसी अपने के लिए

रिश्तों के लिए 

नातों के लिए...............बहुत सुंदर

बधाई स्वीकारें आदरणीय आमोद जी

Comment by MAHIMA SHREE on February 11, 2014 at 9:18pm

बहुत ही खूबसूरत अभिवयक्ति हार्दिक बधाई आपको /सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 11, 2014 at 6:50pm

रिश्तों की गर्माहट बदलते मौसम की तरह जब फंदा फंदा उधड़ती एहसास खोने लगे..तब एक संयत इकाई दूसरी को भविष्य के लिए यही कह सकती है..की यादों को संजो कर फिर नए सिरे से एहसासों के ताने बाने बुनना.... लेकिन किसी और रिश्ते के लिए ? ऐसा क्यों? यदि ऐसा तो उस इकाई की यादों की सिलाइयों पर क्यों ? हर रिश्ता अपने ताने बाने स्वयं ही बुनता है.. किसी दुसरे की यादों पर नए रिश्ते का ताना बाना-यहाँ थोड़ी सी तार्किकता की कमी महसूस हुई..

दूसरा ,

और उस सलाईयों .................उस तो एकवचन संज्ञा के लिए प्रयोग होगा , यहाँ 'उन' होना चाहिए क्योंकि सिलाई नहीं सिलाइयाँ है 

पर अहसासों के ऊन से

तीसरी बात, 

अंत थोड़ा और साधा जा सकता था शाब्दिकता के स्तर पर ..

कुल मिला कर एहसासों  से गुज़रना अच्छा लगा..

हार्दिक बधाई इस रचना पर आ० आमोद कुमार श्रीवास्तव जी  

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 10, 2014 at 9:06pm

मेरी यादों की सलाईयों को 

सहेज कर रख लेना 

फिर कभी ठंड आएगी 

और उस सलाईयों 

पर अहसासों के ऊन से 

फिर रिश्तों का स्वेटर 

बना लेना ...                                                            बहुत ही सुंदर

बधाई बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 10, 2014 at 6:19pm

आदरणीय , सुन्दर अभिव्यक्ति के लिये बधाई ॥

Comment by coontee mukerji on February 10, 2014 at 3:46pm

ऐसा करना 

मेरी यादों की सलाईयों को 

सहेज कर रख लेना 

फिर कभी ठंड आएगी 

और उस सलाईयों 

पर अहसासों के ऊन से 

फिर रिश्तों का स्वेटर 

बना लेना ... 

किसी अपने के लिए

रिश्तों के लिए 

नातों के लिए.... ...बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है....सधुवाद.

Comment by Meena Pathak on February 10, 2014 at 2:51pm

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ..सादर बधाई 

Comment by अरुन 'अनन्त' on February 10, 2014 at 1:30pm

वाह क्या कहने आदरणीय आमोद जी बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति बहुत बहुत बधाई आपको.

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