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ग़ज़ल : - मत पढ़ो सच का ककहरा

ग़ज़ल : - मत पढ़ो सच का ककहरा

ज़ख्म हो जाएगा गहरा ,

मत पढ़ो सच का ककहरा |

 

गड़ रहा आँखों में परचम ,

मैं हूँ गूंगा और बहरा |

 

बह रहा किसका पसीना ,

बांधता है कौन सेहरा |

 

सह रहा खामोश सबकुछ ,

सर्वहारा वर्ग ठहरा |

 

जाल में उगते हैं दाने ,

और दरख्तों पर है पहरा |

 

सुख पखावज की धमक है ,

दुःख है सारंगी का लहरा |

 

गहनों में लकदक व्यवस्था ,

पर बहुत विद्रूप चेहरा |

                        (१८-०१-०५)

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on February 7, 2011 at 3:07pm
आदरणीय शेष जी मुस्कान तो आपकी भी ग़ज़ब ढा रही है | हा हा हा ...
वैसे ग़ज़ल सराहने के लिए आभार स्वीकारें |
कायम रहे ओ.बी.ओ. पर हम सब की मुस्कान ||
Comment by Abhinav Arun on February 6, 2011 at 10:51am
शुक्रिया आशीष जी |
Comment by आशीष यादव on February 6, 2011 at 10:15am
बिलकुल सच्ची ग़ज़ल है सर| आज की दुर्व्यवस्था को बहुत अच्छे ढंग से कह दिया आप ने|
Comment by Abhinav Arun on February 6, 2011 at 9:32am
बहुत बहुत शुक्रिया वीरेंद्र जी | आपने मुझे सराहा आभारी हूँ |
Comment by Veerendra Jain on February 5, 2011 at 10:21pm
 Arun ji...har baar kuch naya aur umda lane ki kala aati hai aapko...bahut bahut badhai...
Comment by Abhinav Arun on February 5, 2011 at 10:55am
आभारी हूँ राणा जी |

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on February 5, 2011 at 9:55am

ज़ख्म हो जाएगा गहरा ,

मत पढ़ो सच का ककहरा |

 

एकदम सच्ची बात| सुन्दर ग़ज़ल

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