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झूठ सत्य की ओट रख, दे दूजे को चोट,

कडुवापन आनंद दे, जब हो मन में खोट |

 

मीठा लगता झूठ है, सनी चासनी बात 

पोल खुले से पूर्व ही, दे जाता आघात |

 

जैसी जिसकी भावना, वैसा बने स्वभाव 

मन में जैसी कामना, मुखरित होते भाव |

 

जितनी सात्विक भावना, तन में  वैसी लोच

पारदर्शी भाव बिना, विकसित हो ना सोच |

 

हिंसा की ही सोच में, प्रतिहिंसा के भाव,

सत्य अहिंसा भाव का, सात्विक पड़े प्रभाव |

(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 1, 2014 at 12:22pm

आपका हार्दिक आभार श्री राम शिरोमणि पाठक जी |

"झूठ सत्य की ओट रख, दे दूजे को चोट,

कडुवापन आनंद दे, जब हो मन में खोट |///////////यह दोहा मै नहीं समझ पाया" हो सकता है मै समझा नहीं सका हो | पर -

- मेरे कहने का आशय यह है कि आदमी सच भी दूसरों को चोट पहुचाने के लिए बोलता है | क्योंकि उसे मजा सच में नहीं कडुवेपण में आता है | अर्थात हमारा झूठ मीठा होता है जिसे हम चलना चाहते है | 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 23, 2014 at 10:15am

दोहे सार्थक लगे यह जानकार ख़ुशी हुई | आपका हार्दिक आभार श्री विजय निकोरे जी 

Comment by ram shiromani pathak on February 22, 2014 at 2:13pm

सुंदर प्रस्तुति आदरणीय लक्ष्मण जी ,हार्दिक बधाई आपको  .........   सादर 

झूठ सत्य की ओट रख, दे दूजे को चोट,

कडुवापन आनंद दे, जब हो मन में खोट |///////////यह दोहा मै नहीं समझ पाया

जितनी सात्विक भावना, तन में  वैसी लोच

पारदर्शी भाव बिना, विकसित हो ना सोच |/////////////यहाँ अटकाव सा लगा

सादर...............

Comment by vijay nikore on February 22, 2014 at 11:57am

सार्थक संदेश देते दोहों के लिए आपको हार्दिक बधाई, आदरणीय लक्ष्मण जी।

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 22, 2014 at 9:58am

दोहे पसंद कर सराहने के लिए धन्यवाद श्री लक्ष्मण धामी जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 22, 2014 at 9:50am

दोहे पसंद करने के लिए आभार श्री गिरिराज भंडारी जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 20, 2014 at 10:59pm

आदरणीय  भाई लक्ष्मण जी , गूढ़  सन्देश देते दोहों के लिये हार्दिक बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 20, 2014 at 5:53pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , सुन्दर सन्देश देते दोहों के लिये आपको हार्दिक बधाई ॥

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